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'गंगा में चिकन बिरयानी खाना अपराध नहीं'! वाराणसी मामले पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बड़ी टिप्पणी

'गंगा में चिकन बिरयानी खाना अपराध नहीं'! वाराणसी मामले पर सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बड़ी टिप्पणी

नई दिल्ली/वाराणसी। वाराणसी में गंगा नदी के बीच नाव पर इफ्तार के दौरान कथित रूप से चिकन बिरयानी खाने के मामले पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि "मुझे पूरा यकीन है कि चिकन बिरयानी खाना कोई अपराध नहीं है। गंगा नदी के ऊपर चिकन खाने पर रोक लगाने वाला कोई कानून मौजूद नहीं है।"

उन्होंने यह टिप्पणी भोपाल स्थित नेशनल लॉ इंस्टीट्यूट यूनिवर्सिटी (NLIU) में आयोजित एक स्मृति व्याख्यान के दौरान की।

'जो अपराध ही नहीं, उसके लिए तीन महीने जेल'

जस्टिस भुइयां ने कहा कि जिन युवाओं को इस मामले में गिरफ्तार किया गया, उन्हें ऐसे कृत्य के लिए कई महीने जेल में रहना पड़ा, जो अपने आप में कोई अपराध नहीं है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के भोजन को केवल इस आधार पर अपराध नहीं माना जा सकता कि उसे लेकर विवाद पैदा हुआ है।

क्या था पूरा मामला?

मार्च 2026 में वाराणसी पुलिस ने नाव पर इफ्तार के दौरान चिकन बिरयानी खाने के आरोप में 14 मुस्लिम युवकों के खिलाफ मामला दर्ज किया था। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि युवकों ने गंगा नदी में चिकन की हड्डियां और खाने का बचा हुआ हिस्सा फेंका, जिससे धार्मिक भावनाएं आहत हुईं और प्रदूषण फैलने का आरोप भी लगाया गया।

इसी आधार पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं तथा जल प्रदूषण से जुड़े प्रावधानों के तहत कार्रवाई की गई थी।

लोकतंत्र में असहमति जरूरी: जस्टिस भुइयां

अपने संबोधन में जस्टिस भुइयां ने शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की मूल भावना बताया। उन्होंने कहा कि आज सामान्य असहमति और विरोध को भी कई बार आपराधिक गतिविधि की तरह देखा जा रहा है, जो चिंता का विषय है।

उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में बहस, असहमति और शांतिपूर्ण प्रदर्शन नागरिकों के मौलिक अधिकार हैं, लेकिन कई मामलों में छात्रों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रदर्शनकारियों को लंबी कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ता है।

मामले पर जारी है कानूनी प्रक्रिया

वाराणसी के इस मामले में कानूनी प्रक्रिया जारी है। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की यह टिप्पणी किसी न्यायिक आदेश का हिस्सा नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कानून, लोकतंत्र और नागरिक स्वतंत्रता पर व्यक्त किए गए उनके विचार हैं। मामले से जुड़े आरोपों और तथ्यों पर अंतिम निर्णय संबंधित न्यायालय की सुनवाई के बाद ही होगा।

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