BHU करेगा राजघाट से मिले मानव कंकाल का जेनेटिक अध्ययन, गंगा घाटी के प्राचीन इतिहास से उठेगा पर्दा
वाराणसी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) ने गंगा घाटी के प्राचीन इतिहास और मानव सभ्यता से जुड़े रहस्यों को उजागर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। विश्वविद्यालय ने राजघाट उत्खनन में प्राप्त एक प्राचीन मानव कंकाल के ऐतिहासिक जेनेटिक अध्ययन की शुरुआत की है।
इस शोध के माध्यम से गंगा घाटी के प्राचीन निवासियों की आनुवंशिक पहचान, जीवनशैली, आहार और सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख पुरास्थल राखीगढ़ी से उनके संभावित संबंधों की वैज्ञानिक जांच की जाएगी।
यह संयुक्त अनुसंधान बीएचयू के जन्तु विज्ञान विभाग तथा प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग द्वारा किया जा रहा है। अध्ययन के लिए चुना गया मानव कंकाल भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण (ASI) और बीएचयू द्वारा राजघाट में किए गए उत्खनन के दौरान प्राप्त हुआ था और अब तक इसका कोई वैज्ञानिक जैविक विश्लेषण नहीं किया गया था।

राजघाट के इतिहास पर नई रोशनी डालने की तैयारी
गंगा और वरुणा नदियों के संगम के निकट स्थित राजघाट वाराणसी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। वर्ष 1957 से 1969 के बीच यहां हुए व्यापक उत्खनन में कई ऐतिहासिक अवशेष प्राप्त हुए थे। इन्हीं में से एक मानव कंकाल को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों की मदद से पहली बार विस्तार से परखा जाएगा।
डीएनए और आइसोटोप विश्लेषण से मिलेंगे अहम सुराग
प्राचीन डीएनए विशेषज्ञ डॉ. प्रज्वल प्रताप सिंह ने कंकाल से नमूने एकत्र किए हैं। इस अध्ययन में प्राचीन डीएनए विश्लेषण के माध्यम से व्यक्ति की आनुवंशिक वंशावली और जनसंख्या संबंधों का पता लगाया जाएगा।

वहीं, स्टेबल आइसोटोप विश्लेषण से उसके भोजन, जीवनशैली और संभावित भौगोलिक गतिविधियों की जानकारी सामने आएगी।
शोधकर्ताओं का विशेष ध्यान इस बात पर रहेगा कि राजघाट के इस मानव अवशेष का आनुवंशिक संबंध राखीगढ़ी (हड़प्पा सभ्यता) से प्राप्त मानव कंकालों से कितना मिलता-जुलता है। इससे सिंधु घाटी और गंगा घाटी की प्राचीन आबादियों के बीच संबंधों पर नई वैज्ञानिक जानकारी मिल सकती है।

बहु-विषयक अनुसंधान को मिलेगा बढ़ावा
बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने इस अध्ययन को विश्वविद्यालय की बहु-विषयक शोध परंपरा का महत्वपूर्ण उदाहरण बताया।
उन्होंने कहा कि यह शोध भारत की प्राचीन विरासत को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझने में अहम भूमिका निभाएगा और पुरातत्व, इतिहास तथा जेनेटिक्स के बीच एक मजबूत सेतु स्थापित करेगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस अध्ययन से गंगा घाटी की प्राचीन मानव आबादी, उनके जीवन, स्वास्थ्य और सांस्कृतिक विकास के बारे में कई नई जानकारियां सामने आएंगी, जो भारतीय इतिहास और पुरातत्व के क्षेत्र में महत्वपूर्ण साबित हो सकती हैं।
