BHU: "वही कविता जीवित रहेगी जो लोक कंठ में बसेगी", नवगीत पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन
वाराणसी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) के हिंदी विभाग और केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी "नवगीत का समकाल" का मंगलवार को गरिमामयी समापन हुआ। रामचंद्र शुक्ल सभागार में आयोजित इस संगोष्ठी के दूसरे दिन विद्वानों ने नवगीत की प्रासंगिकता, भारतीय संस्कृति और इसके भविष्य पर गहन मंथन किया।
कविता की ताकत उसका गद्य न होना है
द्वितीय वैचारिक सत्र की अध्यक्षता करते हुए मशहूर रंगकर्मी प्रो. सुभाष वसिष्ठ ने कहा कि कोई भी कविता शून्य (वैक्यूम) में पैदा नहीं हो सकती। उन्होंने जोर दिया कि जन पक्षधर गीतों को नवगीत में प्रमुखता से शामिल किया जाना चाहिए। वहीं, प्रो. सर्वेश पांडेय ने छंदों की महत्ता पर बात करते हुए कहा कि छंदों से मुक्ति का अर्थ लय और सुर से मुक्ति नहीं है। कविता की असली ताकत यही है कि वह कभी गद्य नहीं हो सकती।

नवगीत में समाज और लोकतत्व का संगम
संगोष्ठी के विभिन्न सत्रों में वक्ताओं ने नवगीत के शिल्प और संवेदना पर प्रकाश डाला...
डॉ. कमलेश राय ने कहा कि नवगीत वही बचेगा जो जनसंवाद का माध्यम बनेगा। कवि कविता में जितना कम दिखेगा, कविता उतनी ही समृद्ध होगी।
प्रो. मनीषा झा ने भारतीय संस्कृति की समरसता को नवगीत का आधार बताया।
प्रो. राम सुधार सिंह के अनुसार, राग की सघनता ही नवगीत को नई कविता से अलग और सशक्त बनाती है।
प्रो. वंदना मिश्र ने कहा कि नवगीत की जड़ें 'लोक' में हैं, और यही इसे जीवंत बनाए रखती हैं।

सृजन का नया सूत्रपात
समापन सत्र में प्रो. राजेंद्र गौतम ने कहा कि अस्सी के दशक में नवगीत का स्वर्ण काल था, लेकिन इस संगोष्ठी के माध्यम से नवगीत की एक नई दिशा का सूत्रपात हुआ है। मुख्य अतिथि प्रो. आनंदवर्धन शर्मा ने उम्मीद जताई कि इस आयोजन के बाद साहित्य जगत में नए नवगीतकार अंकुरित होंगे। अंत में प्रो. वशिष्ठ द्विवेदी ने समग्रता में विचार रखते हुए कहा कि नवगीतकारों को नई कविता के शिल्प से आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि नवगीत की अपनी विशिष्ट संवेदना है।
इस दो दिवसीय आयोजन में प्रो. प्रीति जायसवाल, चर्चित ग़ज़लकार शिवकुमार पराग, डॉ. अवनीश त्रिपाठी और प्रो. प्रकाश उदय सहित देश भर के विद्वानों ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम का संचालन डॉ. विंध्याचल यादव, डॉ. विवेक सिंह और डॉ. महेंद्र कुशवाहा ने किया।
