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वाराणसी: Mahindra Kabira Festival में पहले दिन चला संगीत का जादू

वाराणसी: Mahindra Kabira Festival में पहले दिन चला संगीत का जादू

वाराणसी। 18-20 नवम्बर 2022 तक चलने वाले पहले महिंद्रा कबीरा फेस्टिवल की शुरुआत दिल को छू लेने वाले मधुर संगीत के साथ हुई।


फेस्टिवल में कई जाने-माने कलाकारों ने हिस्सा लिया, और उनकी प्रस्तुतियों में 15वीं सदी के रहस्यवादी कवि कबीर के दर्शन की झलक दिखाई दी।

महिंद्रा ग्रुप, कल्चरल आउटरीच के हेड और वाईस प्रेसिडेंट, जय शाह ने फेस्टिवल के बारे में कहा, “महिंद्रा कबीरा फेस्टिवल के पहले दिन के सूरज ने हमारे दिलों को कृतज्ञता से भर दिया कि हम वाराणसी में फेस्टिवल का एक और संस्करण प्रस्तुत करने में सफल रहे। इस संस्करण में शास्त्रीय संगीत, चर्चाओं और भ्रमण के विविध कार्यक्रमों द्वारा कबीर के विचारों, उनके दर्शन को आत्मसात करने की कोशिश की गई।”

टीमवर्क आर्ट्स के मैनेजिंग डायरेक्टर, संजॉय के. रॉय ने कहा, “महिंद्रा कबीरा का अस्तित्व आज से सात साल पहले इस विचार के साथ आया कि उनका दर्शन वर्तमान संसार के लिए कितना प्रासंगिक है। और फिर हम हर साल, इस समयातीत नगर में मधुर संगीत और संत कबीर की वाणी के मोह में लौटने लगे।

फेस्टिवल की शुरुआत पावन गंगा के तट से हुई, और हमने कोशिश की यह इवेंट पर्यावरण के लिए मददगार रहे। हम प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं करते और अधिक से अधिक रीयूजेबल प्रोडक्ट को अपनाने पर बल देते हैं। इसके लिए हमने एक गैर-लाभकारी संस्था के साथ साझेदारी की है। जल्द ही यह फेस्टिवल जीरो कार्बन के क्षेत्र में यूएन प्रोग्राम में शामिल होगा।”

फेस्टिवल की मधुर सुबह में, हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रातः राग बैरागी और धुन को इंडियन क्लासिकल स्लाइड गिटार बजाने वाले पहली महिला, विदूषी डॉ. कमला शंकर ने युवा गिटारिस्ट श्री निर्मल सैनी, बनारस घराना के अनुयायी और सिद्ध तबला वादक पं. काशीनाथ खांडेकर, पंडित विनोद लेले के साथ प्रस्तुत किया।

महिंद्रा कबीरा के छठे संस्करण में प्रस्तुति देने का रोमांच साझा करते हुए, शंकर ने कहा, “महिंद्रा कबीरा फेस्टिवल में मैंने अपने साथियों और अनुयायियों के साथ शंकर गिटार पर प्रस्तुति दी।

मैंने अपनी परफोर्मेंस की शुरुआत राग बैरागी से की, जिसका अर्थ संसार में जीवन के अस्तित्व और उसकी निरर्थकता से लिया गया है। मैंने इस राग को चुना, क्योंकि गंगा नदी के किनारे होने वाले इस फेस्टिवल को इससे एक अध्यात्मिक आगाज़ मिला।”

संगीत सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं है, यह एक आराधना है। ये शब्दों का ऐसा सफ़र है, जो आपको आनंद की स्थिति में ले जाता है। फेस्टिवल में सुबह के सुरों को और ताजगी प्रदान करते हुए, ध्रुपद कबीर नामक एक एक्ट प्रस्तुत किया गया।

एक्ट प्रस्तुत किया ‘डगर बानी’ के उभरते युवा गायक और बनारस घराना के ‘चरपट की गायकी’ के सिद्ध गायक आशीष कुमार जायसवाल, और पखवाजा के प्रतिभाशाली कलाकार, डॉ. अंकित पारीख ने। इसके बाद अकादमिक, अध्यात्मिक मार्गदर्शक और थियोलोजी के रिसर्चर, उमेश कबीर ने एक अध्यात्मिक एक्ट प्रस्तुत किया, जहाँ उन्होंने इस रहस्यवादी कवि के कार्य की गहराई में उतरकर कबीर के दर्शन की पुष्टि करने का प्रयास किया।

अपनी परफोर्मेंस को बात करते हुए, जायसवाल ने कहा, “परफोर्मेंस के पहले भाग में राग को दक्षता से खोलते हुए, एक आलाप के साथ मिलाया, जो ध्यान में सहायता करता है। यह मद्धम और दृढ़ संगीतमयी शुरुआत आपको सुरों के सागर में ले जाकर धीमे-धीमे अपनी गति बढ़ाती है।

परफॉरमेंस के दूसरे भाग में ‘पाडा’ प्रस्तुत किया। गायक और पखावज वादक ने साथ में मिलकर महिंद्रा कबीरा के श्रोताओं को एक अनुपम अनुभव प्रदान कराया।”

फेस्टिवल में अपनी प्रस्तुति के विषय में, उमेश कबीर ने कहा, “मैंने कबीर के चातुर्यपूर्ण ज्ञान में डुबकी लगाई, और उनके दोहों के माध्यम से उनके धर्म-निरपेक्ष और धार्मिक सहिष्णुता को परखा, अंधविश्वास, बेमतलब के रिवाजों और पाखंड के विरोध के तरीकों को समझा। मैंने उनके दर्शन और वर्तमान समय में उसकी प्रासंगिकता पर बात की।

कबीर के दोहों में साहस, बिंदासपन और निडरता है, जो समाज में व्याप्त साम्प्रदायिक सोहाद्र की कमी की ओर इशारा करते हैं और समाज के दिखावे को उजागर करते हैं।”

गुलेरिया घाट पर दोपहर में हुए एक विवेकपूर्ण सत्र में, किरण नादर म्यूजियम ऑफ़ आर्ट की डायरेक्टर और चीफ क्यूरेटर, डॉ. रूबीना करोडे ने ओजस आर्ट के डायरेक्टर अनुभव नाथ के साथ संवाद किया। उन्होंने साथ में भारतीय कला के आविष्कारक नजरिये और समकालीन कला क्षेत्र में नए विचारों पर चर्चा की ।

कबीर के ज्ञान पर बात करते हुए, नाथ ने कहा, “कबीर के दोहों को बहुत से संगीतकारों ने अपनी धुनों में उतारा है, जिन्हें बहुत लोकप्रियता भी मिली। हमारे सत्र में हमने विजुअल आर्ट के माध्यम से कबीर के ज्ञान की प्रस्तुति पर चर्चा की। महिंद्रा कबीरा फेस्टिवल का विकास बहुत ही स्वाभाविक ढंग से हुआ और ये कबीर, संगीत और वाराणसी में दिलचस्पी रखने वालों के लिए बहुत ज़रूरी है। ये तीनों ही पहलु मेरे दिल के बहुत करीब हैं।”

दोपहर के सत्र के समापन पर, पुरस्कृत कर्नाटिक गायिका, सुषमा सोम ने अपनी प्रसिद्ध एल्बम, ‘होम’ से प्रस्तुति दी। उनके साथ तबले पर थे प्रवीण स्पर्श और गिटार पर अभिनंदन आर.। सुषमा ने अपने पुराने गीतों के साथ ही, रबीन्द्रनाथ टैगोर, शैविते संत तयुमनावर और संत कबीर के भी गीत प्रस्तुत किये। उन्होंने अपने नए आने वाले गीतों में से भी दो गीत श्रोताओं की फरमाइश पर प्रस्तुत किए।

फेस्टिवल में अपनी प्रस्तुति को लेकर सोम ने कहा, “बचपन से ही, संगीत मेरे लिए उस वाहन के समान रहा है, जिस पर चढ़कर मैंने कई ऐसे अनुभवों को जिया, जो इस भौतिक जगत से परे थे। आज भी, जब मैं इसे अनुभव करती हूँ, तो अपने संगीत के माध्यम से इस अनुभव को दूसरों तक भी पहुँचाने की कोशिश करती हूँ। मेरी अनुभूति आज पर्यावरण और पृथ्वी से जुड़ी हैं दृ और आज मैं संगीत को उनके माध्यम से देखती हूँ।”

शाम के शानदार प्रोग्राम की शुरुआत लिटिल फ्लावर हाउस स्कूल की ख़ूबसूरती प्रस्तुति से हुई। इसके बाद द इशारा पपेट थियेटर व सोल बैंड ने कबीर के दोहों पर आधारित संगीतमय कठपुतली का प्रोग्राम प्रस्तुत किया। और फिर बारी आई अनाहत की, जिसमें पं. शुभेन्द्र राव और उस्ताद सस्किया राव-दे-हास ने सितार प्रस्तुति दी।

फेस्टिवल में अपनी प्रस्तुति के विषय में, पद्म श्री, दादी डी. पद्मजी ने कहा, “द इशारा पपेट थियेटर ट्रस्ट और सोल बैंड के संयोजन के साथ फेस्टिवल में ये प्रस्तुति हमारे लिए गर्व का विषय रही। कॉन्सर्ट मेरी पत्नी, सस्किया राव-दे हास के साथ एक अनोखी जुगलबंदी रहा। सस्किया एक शानदार संगीतकार हैं, जो इंडियन चेलो की शुरुआत करने वालों में अग्रणी रहीं।

कबीर के गीतों का एक बेहतरीन अनुवाद है, जिसे और किसी ने नहीं, खुद रबीन्द्रनाथ टैगोर ने किया है। उस रचना में कबीर हजारों सरस्वती के संगीत सुनने की बात करते हैं, जहाँ कोई अनाहत स्थिति तक पहुँच सकता है। तो हमारे संगीत और कबीर के दर्शन के सम्मिलन से ये प्रस्तुति एक यादगार प्रस्तुति बन गई।”

प्रोग्राम का समापन फेस्टिवल में एक स्पेशल कॉन्सर्ट के साथ हुआ, जिसमें पद्म श्री अरुणा साईराम ने पारम्परिक कर्नाटिक प्रस्तुति के माध्यम से रहस्यवादी कवि की रचनाओं को प्रस्तुत किया। अपनी परफॉरमेंस पर बात करते हुए, साईराम ने कहा, “महिंद्रा कबीरा फेस्टिवल एक ग्रेट प्लेटफार्म है, जो हमारी विविधता का उत्सव मनाते हुए, उसे कबीर के ज्ञान के माध्यम से जोड़ने की कोशिश करता है।

हर कलाकार का सपना होता है कि वो ऐसा संगीत बनाए, जो पूरी दुनिया को आकर्षित करे, और उसके माध्यम महान कवि के दर्शन को प्रस्तुत करना तो मानो सोने पर सुहागा था।”

महिंद्रा कबीरा फेस्टिवल प्रकृति के प्रति पाने जिम्मेदारी को महसूस करते हुए एक ‘जीरो-वेस्ट’ इवेंट है। फेस्टिवल ने सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के इस्तेमाल से बाहर आते हुए, ऐसे मटिरियल का चुनाव किया जिसे फिर से इस्तेमाल किया जा सकता है।

अब महिंद्रा कबीरा देश का दूसरा सबसे बड़ा ग्रीन फेस्टिवल बन गया है! फेस्टिवल का हर पल श्रोताओं के लिए एक खास अनुभव को समेटे था। फेस्टिवल के छठे संस्करण के अंतिम दिन में और भी कई शानदार प्रस्तुतियां होनी अभी बाकी हैं।

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