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इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला! इस्लाम कबूल करने वाली बहनों को मिलेंगे 25 लाख मुआवजा

इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला! इस्लाम कबूल करने वाली बहनों को मिलेंगे 25 लाख मुआवजा

प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता और बालिग व्यक्ति की निजी पसंद को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

कोर्ट ने इस्लाम धर्म अपनाने वाली दो बहनों को उनके पिता के घर में कथित तौर पर उनकी इच्छा के खिलाफ रखने के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए दोनों बहनों को कुल 25 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। यह राशि दोनों बहनों के बीच बराबर बांटी जाएगी।

न्यायमूर्ति संदीप जैन की पीठ ने दोनों महिलाओं की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका स्वीकार करते हुए कहा कि बालिग व्यक्ति को अपने धर्म, रहने की जगह और निजी जीवन से जुड़े फैसले लेने का संवैधानिक अधिकार है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि परिवार या राज्य किसी बालिग की वैध निजी पसंद में मनमाने ढंग से हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

कोर्ट में दोनों बहनों ने बताई अपनी मर्जी

छह अगस्त को कोर्ट के समक्ष पेश हुईं दोनों बहनों ने स्पष्ट रूप से कहा कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम धर्म अपनाया है। अंशु भाटिया ने बताया कि उसने वर्ष 2020 में धर्म बदला, जबकि दिया भाटिया ने कहा कि उसने वर्ष 2021 में इस्लाम स्वीकार किया।

दोनों ने कोर्ट के सामने कहा कि उनका फैसला उनके अपने विश्वास, अंतरात्मा, मानसिक शांति और आध्यात्मिक संतुष्टि से जुड़ा था। उन्होंने धर्म परिवर्तन में किसी तरह के दबाव, धोखाधड़ी, अनुचित प्रभाव, लालच या जबरदस्ती की बात से इनकार किया।

महिलाओं का आरोप था कि धर्म परिवर्तन के बाद उनके पिता ने उन्हें उनकी इच्छा के विरुद्ध घर में रहने के लिए मजबूर किया।

राज्य सरकार की दलील को कोर्ट ने नहीं माना

मामले में उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से महिलाओं के पिता द्वारा दर्ज कराई गई एफआईआर का हवाला देते हुए याचिका का विरोध किया गया। एफआईआर में आरोप लगाया गया था कि दोनों बहनों का धर्म परिवर्तन जबरदस्ती और धोखे से कराया गया।

जांच के दौरान उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2021 की संबंधित धाराएं भी जोड़ी गईं।

राज्य सरकार ने अदालत के समक्ष दलील दी कि कथित धर्म परिवर्तन किसी बड़ी साजिश का हिस्सा हो सकता है और महिलाओं की रिहाई से जांच प्रभावित होने की आशंका है।

हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि एफआईआर और धर्म परिवर्तन से जुड़े आरोपों की जांच कानून के मुताबिक जारी रह सकती है। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका में कोर्ट की ओर से की गई टिप्पणियां उस आपराधिक जांच को प्रभावित नहीं करेंगी।

राज्य मशीनरी की भूमिका पर भी सवाल

हाईकोर्ट ने महिलाओं की स्वतंत्रता की रक्षा करने में राज्य मशीनरी की भूमिका पर भी गंभीर टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि महिलाओं की रिहाई सुनिश्चित करने के बजाय कथित अवैध हिरासत जारी रहने दी गई।

अदालत ने इसे संवैधानिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन माना और परिस्थितियों को देखते हुए संवैधानिक मुआवजा दिए जाने को उचित बताया।

कोर्ट ने निर्देश दिया कि दोनों महिलाओं को कुल 25 लाख रुपये की राशि दी जाए और इसका भुगतान दोनों में बराबर किया जाए। आदेश का अनुपालन आठ सप्ताह के भीतर कराने का निर्देश दिया गया है।

बालिग व्यक्ति को अपनी जिंदगी के फैसले लेने की आजादी

कोर्ट ने दोनों महिलाओं से सीधे बातचीत करने के बाद उनके बयानों को रिकॉर्ड किया। अदालत के मुताबिक उनके जवाब स्पष्ट और स्वाभाविक थे तथा ऐसा कोई संकेत नहीं मिला कि वे डर, दबाव, लालच या अनुचित प्रभाव में फैसला ले रही थीं।

हाईकोर्ट ने कहा कि बालिग होने के बाद व्यक्ति को अपनी आस्था, विश्वास, रहने की जगह, संबंधों और निजी जीवन से जुड़े फैसले लेने की स्वतंत्रता प्राप्त है। यह अधिकार संविधान के तहत संरक्षित है।

अनुच्छेद 21 और 25 का दिया हवाला

अदालत ने अपने फैसले में संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 25 से जुड़े अधिकारों पर जोर दिया। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा करता है, जबकि अनुच्छेद 25 व्यक्ति को धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार देता है।

कोर्ट ने कहा कि अपनी पसंद के अनुसार जीवन जीने का अधिकार व्यक्ति की गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा है।

किसी बालिग व्यक्ति की वैध निजी पसंद में परिवार या राज्य का हस्तक्षेप सामान्य तौर पर स्वीकार्य नहीं हो सकता, जब तक कानूनन या संवैधानिक रूप से ऐसा हस्तक्षेप उचित न हो।

अपनी पसंद की जगह और व्यक्ति के साथ रहने के लिए स्वतंत्र

हाईकोर्ट ने दोनों बहनों को अपनी पसंद की जगह और अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने की स्वतंत्रता दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उनके पिता, राज्य या कोई अन्य व्यक्ति उनकी इस वैध पसंद में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

हालांकि, अदालत ने यह भी साफ किया कि धर्म परिवर्तन से जुड़े आरोपों की आपराधिक जांच अपने कानूनी दायरे में जारी रह सकती है।

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