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नगर निगम सदन में हंगामा, देरी से पहुंचे अधिकारी तो भड़के पार्षद

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गोरखपुर। नगर निगम का सदन मंगलवार को शुरू होने से पहले ही विवादों में घिर गया। निर्धारित समय सुबह 11 बजे की बजाय बैठक साढ़े 11 बजे शुरू होने पर पार्षदों का गुस्सा फूट पड़ा। नगर आयुक्त और महापौर के देर से सदन हाल में पहुंचते ही पार्षदों ने तीखी प्रतिक्रिया देते हुए इसे जनप्रतिनिधियों का अपमान करार दिया।

करीब आधे घंटे तक इंतजार करने के बाद जब अधिकारी सदन में पहुंचे, तो पार्षदों ने एक स्वर में विरोध दर्ज कराया। उनका कहना था कि जब पार्षद समय से उपस्थित हो सकते हैं, तो अधिकारियों को भी समय की पाबंदी का पालन करना चाहिए। पार्षद रवींद्र सिंह ने कड़े शब्दों में कहा कि “अपमान के बल पर सदन नहीं चलेगा,” और चेतावनी दी कि यदि यही रवैया रहा तो सदन चलाना मुश्किल हो जाएगा।


सदन में एक और बड़ा मुद्दा उस समय उठा जब पार्षदों ने “सम्भव” कार्यक्रम को लेकर सवाल खड़े किए। हर मंगलवार को आयोजित होने वाला “सम्भव” कार्यक्रम उसी समय नीचे सभागार में चल रहा था, जबकि ऊपर सदन हाल में बैठक बुलाई गई थी। पार्षदों ने आरोप लगाया कि एक ही समय पर दो महत्वपूर्ण कार्यक्रम रखकर अधिकारियों को “सम्भव” में व्यस्त कर दिया गया, जिससे सदन की कार्यवाही प्रभावित हुई।

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पार्षदों ने कहा कि यह प्रशासनिक लापरवाही का स्पष्ट उदाहरण है। जब सदन की बैठक निर्धारित थी, तो अधिकारियों की उपस्थिति सदन में सुनिश्चित की जानी चाहिए थी। लेकिन इसके उलट अधिकारी नीचे कार्यक्रम में व्यस्त रहे और सदन में देरी से पहुंचे। इसे पार्षदों ने सदन की गरिमा के साथ खिलवाड़ बताया।


इसके अलावा, पूर्व पार्षद रोजा खातून (हुमायूंपुर) के निधन के बाद सदन का मिनट्स जारी न किए जाने का मुद्दा भी जोर-शोर से उठा। पार्षदों ने इसे असंवेदनशीलता करार देते हुए कहा कि एक जनप्रतिनिधि के निधन के बाद यह न्यूनतम औपचारिकता होती है, जिसे नजरअंदाज किया गया।

साथ ही, पूर्व नगर आयुक्त के महराजगंज में जिलाधिकारी बनने के बाद हुए विदाई समारोह की सूचना पार्षदों को न दिए जाने पर भी सवाल उठाए गए। पार्षदों का कहना था कि यह नगर निगम की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता की कमी को दर्शाता है और जनप्रतिनिधियों की अनदेखी का उदाहरण है।

लगातार बढ़ते विरोध के बीच अपर नगर आयुक्त प्रमोद कुमार ने स्थिति संभालने का प्रयास किया। उन्होंने दोनों मामलों में नगर निगम की ओर से हुई चूक को स्वीकार करते हुए सदन में खेद व्यक्त किया और आश्वासन दिया कि भविष्य में ऐसी गलतियां नहीं दोहराई जाएंगी।


हालांकि, पार्षदों का आक्रोश पूरी तरह शांत नहीं हो सका। माहौल इतना गरमा गया कि आगे की कार्यवाही जारी रखना संभव नहीं रहा। इसके बाद सदन में पूर्व पार्षद रोजा खातून की आत्मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन रखा गया।


मौन के उपरांत बैठक को स्थगित कर दिया गया। इस तरह, अहम मुद्दों पर चर्चा होने से पहले ही सदन की कार्यवाही समाप्त हो गई। आज की घटना ने नगर निगम की कार्यशैली, समय प्रबंधन और प्रशासनिक तालमेल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्षदों ने साफ कहा कि यदि समय की पाबंदी और पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं की गई, तो ऐसे टकराव आगे और बढ़ सकते हैं। यह घटनाक्रम प्रशासन के लिए एक स्पष्ट संकेत है कि जनप्रतिनिधियों के सम्मान और सदन की गरिमा को नजरअंदाज करना अब भारी पड़ सकता है।

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