तिलौरा की बेटी ने रचा इतिहास, 22 की उम्र में सेना की वर्दी पहन बनीं लेफ्टिनेंट
गोरखपुर। पाली ब्लॉक क्षेत्र के तिलौरा गांव की बेटी रितिका दुबे ने महज 22 वर्ष की उम्र में भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट बनकर जिले और क्षेत्र का नाम रोशन किया है। साधारण पारिवारिक परिवेश से निकलकर सेना की अधिकारी बनने तक का उनका सफर मेहनत, अनुशासन, आत्मविश्वास और दृढ़ संकल्प की ऐसी प्रेरक कहानी है, जो क्षेत्र की बेटियों और युवाओं के लिए मिसाल बन गई है।
रितिका के पिता रामनिवास दुबे छोटे व्यवसायी हैं, जबकि माता गीता देवी शिक्षामित्र हैं। उनके बाबा धीरेंद्र कुमार दुबे जोगिया इंटर कॉलेज में शारीरिक शिक्षा के प्रवक्ता रह चुके हैं। परिवार में दो भाई और एक बहन हैं तथा रितिका सबसे बड़ी हैं। परिवार से मिले संस्कार और शिक्षा ने बचपन से ही उनके भीतर अनुशासन और आगे बढ़ने का जज्बा पैदा किया।
शिक्षा के साथ खेल में भी बनाई पहचान
रितिका ने कक्षा छह से दस तक की शिक्षा विद्याज्ञान से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने आरपीएम ग्रीन सिटी, गोरखपुर से 11वीं और 12वीं की पढ़ाई पूरी की। उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने क्रिया यूनिवर्सिटी, आंध्र प्रदेश से स्नातक किया।
पढ़ाई के साथ रितिका की रुचि एथलेटिक्स में भी रही। खेल के मैदान में लगातार अभ्यास, अनुशासन और मेहनत ने उनके व्यक्तित्व को निखारा। यही खेल भावना आगे चलकर सेना में अधिकारी बनने के उनके सपने की मजबूत आधारशिला बनी।
पहले प्रयास में एसएसबी पास कर बढ़ाया कदम
सेना में अधिकारी बनने के लक्ष्य को लेकर रितिका ने कड़ी मेहनत की और अपने पहले ही प्रयास में एसएसबी परीक्षा उत्तीर्ण कर ली। इसके बाद सितंबर 2025 में उनका चयन चेन्नई स्थित ऑफिसर्स ट्रेनिंग अकादमी (OTA) में सैन्य प्रशिक्षण के लिए हुआ।
OTA में उन्होंने कठिन सैन्य प्रशिक्षण को सफलतापूर्वक पूरा किया। प्रशिक्षण के दौरान अनुशासन, शारीरिक क्षमता, नेतृत्व क्षमता और मानसिक दृढ़ता की कठिन कसौटियों पर खरा उतरने के बाद रितिका को भारतीय सेना में लेफ्टिनेंट के पद पर कमीशन मिला।
गांव की बेटी से सेना की अफसर तक का सफर
रितिका की यह उपलब्धि सिर्फ उनके परिवार की खुशी नहीं है, बल्कि पूरे तिलौरा गांव और पाली क्षेत्र के लिए गर्व का विषय है। गांव की गलियों से निकलकर देश की रक्षा के लिए भारतीय सेना की वर्दी पहनना उनकी सफलता को और खास बनाता है।
रितिका का सफर उन युवाओं के लिए संदेश है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखते हैं। उन्होंने साबित किया कि सपना बड़ा हो, लक्ष्य स्पष्ट हो और मेहनत में निरंतरता हो तो गांव की बेटी भी देशसेवा की सर्वोच्च जिम्मेदारियों तक पहुंच सकती है।
बेटियों के लिए बनीं प्रेरणा
रितिका दुबे आज सिर्फ अपने माता-पिता और परिवार का गौरव नहीं हैं, बल्कि क्षेत्र की बेटियों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं। उनकी सफलता यह संदेश देती है कि बेटियों को अवसर और सही मार्गदर्शन मिले तो वे किसी भी क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का परचम लहरा सकती हैं।
तिलौरा की बेटी रितिका दुबे की सफलता ने गांव का सिर गर्व से ऊंचा कर दिया है। 22 वर्ष की उम्र में सेना की वर्दी पहनकर उन्होंने न सिर्फ अपने सपने को साकार किया, बल्कि अपने गांव से देशसेवा की एक नई प्रेरक कहानी भी लिख दी।
