जितिया व्रत क्यों रखा जाता है? जानिए जीवित्पुत्रिका व्रत की पौराणिक कथा और महत्व
वाराणसी। संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी जीवन की कामना को लेकर माताएं जितिया व्रत रखती हैं। इसे जीवित्पुत्रिका व्रत और जीउतिया के नाम से भी जाना जाता है। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में इस व्रत की धार्मिक मान्यता काफी अधिक है। मान्यता है कि जितिया व्रत करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं और उसे दीर्घायु का आशीर्वाद मिलता है। यह व्रत अश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है और इसमें माताएं कठिन निर्जला उपवास करती हैं।

भगवान जीऊतवाहन से जुड़ी मान्यता
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जितिया व्रत का संबंध भगवान जीऊतवाहन से माना जाता है। पौराणिक कथा में बताया गया है कि महाभारत काल में अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति से उस शिशु को जीवन प्रदान किया। बाद में उसका नाम जीवित्पुत्रिका रखा गया। इसी घटना को संतान की रक्षा और दीर्घायु की कामना से जुड़े जितिया व्रत की परंपरा से जोड़ा जाता है।
चील और सियारिन की कथा भी है प्रचलित
जितिया व्रत से जुड़ी एक अन्य लोककथा चील और सियारिन की है। मान्यता के अनुसार दोनों एक पेड़ पर रहती थीं और उनमें काफी मित्रता थी। एक बार गांव की महिलाओं को जितिया व्रत की तैयारी करते देखकर चील ने भी व्रत रखने का निर्णय लिया। सियारिन ने भी उसके साथ उपवास करने की बात कही। हालांकि व्रत के दौरान भूख-प्यास से परेशान होकर सियारिन अपना संयम खो बैठी, जबकि चील ने पूरे नियम और श्रद्धा के साथ व्रत पूरा किया।
अगले जन्म में सामने आया व्रत का फल
कथा के अनुसार अगले जन्म में दोनों ने एक राजा के घर बहनों के रूप में जन्म लिया। बड़ी बहन के सात पुत्र हुए, जबकि छोटी बहन की संतान जीवित नहीं रह सकी। ईर्ष्या के कारण छोटी बहन ने बड़ी बहन के सातों पुत्रों को मरवा दिया। इसके बाद भगवान जीऊतवाहन की कृपा से सातों पुत्रों को दोबारा जीवन मिल गया। वहीं भेजे गए कटे हुए सिर फल में बदल गए। जब छोटी बहन को अपने पूर्व जन्म और अपने कर्मों का ज्ञान हुआ तो उसे अपनी गलती का पश्चाताप हुआ।
जितिया व्रत की इन कथाओं में संतान की रक्षा, दीर्घायु और मातृ-स्नेह को प्रमुख भाव के रूप में बताया गया है। हालांकि इन कथाओं से जुड़ी जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं।
( इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक कथाओं और लोक-परंपराओं पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सामान्य जनरुचि और जानकारी प्रदान करना है। इन मान्यताओं की किसी वैज्ञानिक या ऐतिहासिक तथ्य के रूप में पुष्टि नहीं की जाती है।)
