नवरात्रि: आज होगी देवी के दो स्वरूपों की पूजा, इन चीजों का रखें ध्यान
नवरात्रि 2021
शारदीय नवरात्रि की शुरुआत हो चुकी है. इस बार नवरात्रि आठ दिन के हैं इस वजह से देवी मां के दो स्वरूपों की एक साथ पूजा होगी. वैसे तो तीसरे दिन मां चंद्रघंटा की पूजा का विधान हैं, लेकिन दो तिथियां एक साथ होने की वजह से इस दिन मां कुष्मांडा की भी पूजा होगी. इस दिन व्रत रखने वाले जातक दोनों देवियों का एक साथ भी पूजन कर सकते हैं.

शारदीय नवरात्रि की तृतीया और चतुर्थी एक ही दिन की है. ज्योतिषाचार्यो के अनुसार तृतीया तिथि 9 अक्टूबर सुबह 7 बजकर 48 मिनट तक रहेगी. इसके बाद चतुर्थी शुरू हो जाएगी, जो 10 अक्टूबर सूर्योदय से पहले 4 बजकर 54 मिनट तक रहेगी. इसलिए 9 अक्टूबर शनिवार को उदयातिथि होने की वजह से मां चंद्रघंटा की पूजा करना शुभ रहेगा. वहीं इसके बाद जातक मां कुष्मांडा का पूजन करें. या फिर जातक दोनों देवियों का एक साथ भी पूजन कर सकते हैं, हालांकि दोनो दोनों दे​वी के स्वरूपों की पूजा करने के दौरान उनके अलग अलग नियमों और भोग का ध्यान रखना जरूरी है।

जानें दोनों देवी के दोनों स्वरूपों की पूजा विधि-

मां चंद्रघंटा:  नवरात्रि का तीसरा दिन भय से मुक्ति और अपार साहस प्राप्त करने का होता है. इस दिन मां के 'चंद्रघंटा' स्वरूप की उपासना की जाती है. इनके सिर पर घंटे के आकार का चन्द्रमा है. इसलिए इनको चंद्रघंटा कहा जाता है. इनके दसों हाथों में अस्त्र-शस्त्र हैं और इनकी मुद्रा युद्ध की है. मां चंद्रघंटा तंत्र साधना में मणिपुर चक्र को नियंत्रित करती हैं. मान्यता है कि शेर पर सवार मां चंद्रघंटा की पूजा करने से भक्तों केकष्ट हमेशा के लिए खत्म हो जाते हैं. इन्हें पूजने से मन को शक्ति और वीरता मिलती है. ज्योतिष में इनका संबंध मंगल नामक ग्रह से होता है।

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मां चंद्रघंटा की पूजा विधि-

मां चंद्रघंटा की पूजा में लाल वस्त्र धारण करना श्रेष्ठ होता है. मां को लाल पुष्प, रक्त चन्दन और लाल चुनरी समर्पित करना उत्तम होता है. इनकी पूजा से मणिपुर चक्र मजबूत होता है और भय का नाश होता है. अगर इस दिन की पूजा से कुछ अद्भुत सिद्धियों जैसी अनुभूति होती है, तो उस पर ध्यान न देकर आगे साधना करते करते रहनी चाहिए. अगर कुंडली में मंगल कमजोर है या मंगल दोष है तो आज की पूजा विशेष परिणाम दे सकती है. पहले मां के मन्त्रों का जाप करें फिर मंगल के मूल मंत्र "ॐ अँ अंगारकाय नमः" का जाप करें।

मां चंद्रघंटा को लगाएं ये भोग- 

हर देवी के हर स्वरूप की पूजा में एक अलग प्रकार का भोग चढ़ाया जाता है. कहते हैं भोग देवी मां के प्रति आपके समर्पण का भाव दर्शाता है. मां चंद्रघंटा को दूध या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाना चाहिए. प्रसाद चढ़ाने के बाद इसे स्वयं भी ग्रहण करें और दूसरों में बांटें. देवी को ये भोग समर्पित करने से जीवन के सभी दुखों का अंत हो जाता है.

माँ का चतुर्थ स्वरूप 'मां कुष्मांडा' -

आज माँ के चतुर्थ स्वरूप 'मां कुष्मांडा' की भी पूजन तिथि है जो 7 बजकर 49 मिनट से 10 अक्टूबर सूर्योदय से पहले 4 बजकर 54 मिनट तक रहेगी. अतः आज माँ के दो स्वरूपो की पुजा की जाएगी, अपनी मंद मुस्‍कान द्वारा ब्रह्मांड की उत्‍पत्ति करने के कारण देवी के इस रूप को कुष्मांडा कहा गया है. ऐसी मान्‍यता है कि जब दुनिया नहीं थी, तब इन्हीं देवी ने अपने हास्य से ब्रह्मांड की रचना, इसीलिए इन्‍हें सृष्टि की आदिशक्ति कहा गया. मां कुष्मांडा की आठ भुजाएं हैं. इनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल-पुष्प, अमृतपूर्ण कलश, चक्र, गदा व जप माला हैं. देवी का वाहन सिंह है.

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माता के इस रूप का महत्‍व -

मां कुष्‍मांडा की उपासना से भक्तों को सभी सिद्धियां मिलती हैं. मां कुष्‍मांडा की कृपा से लोग नीरोग होते हैं और आयु व यश में बढ़ोतरी होती है. शांत-संयत होकर, भक्‍ति-भाव से मां कुष्मांडा की पूजा करनी चाहिए. इस दिन माता को मालपुआ का प्रसाद और हरे फल चढ़ाने चाहिए. माना जाता है कि इससे बुध ग्रह मजबूत होता है और बुद्धि भी प्रखर होती है।

मां कुष्मांडा की पूजन विधि-

हरे कपड़े पहनकर मां कुष्माण्डा का पूजन करें. पूजन के दौरान मां को हरी इलाइची, सौंफ और कुम्हड़ा अर्पित करें. इसके बाद उनके मूल मंत्र 'ॐ कुष्मांडा देव्यै नमः' का 108 बार जाप करें. आप चाहें तो सिद्ध कुंजिका स्तोत्र का पाठ भी कर सकते हैं

मां कुष्मांडा को ये लगाएं भोग- 

मां कुष्मांडा को मालपुआ का भोग लगाया जाता है. इस दिन माता के भक्त नारंगी वस्त्र पहनकर देवी कुष्मांडा की पूजा करते हैं. इस दिन मालपुआ से बना प्रसाद किसी ब्राह्मण को दान करने से बुद्धि का विकास होता है।

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