नवरात्रि के सातवें दिन होती है माँ कालरात्रि की पूजा,इस मंत्र का करे जाप
चैत्र नवरात्र चल रही हैं और इसमें सप्तमी तिथि पर महाशक्ति मां दुर्गा का सातवां स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। मां कालरात्रि काल का नाश करने वाली हैं, इसी वजह से इन्हें कालरात्रि कहा जाता है। नवरात्र के सातवें दिन यानि 12 अप्रैल को मां कालरात्रि की पूजा करने से हमारे मन का हर प्रकार का भय नष्ट होता है। जीवन की हर समस्या को पलभर में हल करने की शक्ति प्राप्त होती है। शत्रुओं का नाश करने वाली मां कालरात्रि अपने भक्तों को हर परिस्थिति में विजय दिलाती हैं।

चैत्र नवरात्र चल रही हैं और इसमें सप्तमी तिथि पर महाशक्ति मां दुर्गा का सातवां स्वरूप मां कालरात्रि की पूजा की जाती है। मां कालरात्रि काल का नाश करने वाली हैं, इसी वजह से इन्हें कालरात्रि कहा जाता है। नवरात्र के सातवें दिन यानि 12 अप्रैल को मां कालरात्रि की पूजा करने से हमारे मन का हर प्रकार का भय नष्ट होता है। जीवन की हर समस्या को पलभर में हल करने की शक्ति प्राप्त होती है। शत्रुओं का नाश करने वाली मां कालरात्रि अपने भक्तों को हर परिस्थिति में विजय दिलाती हैं।


मां कालरात्रि की कथा:


एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक बहुत बड़ा राक्षस रक्तबीज था। इस दानव ने लोगों के साथ देवताओं को भी परेशान कर रखा था। रक्तबीज दानव की विशेषता यह थी कि जब उसके खून की बूंद (रक्त) धरती पर गिरती थी तो बिलकुल उसके जैसा दानव बन जाता था। दानव की शिकायत लेकर सभी भगवान शिव के पास पहुंचे। भगवान शिव जानते थे कि इस दानव का अंत माता पार्वती कर सकती हैं।

भगवान शिव ने माता से अनुरोध किया।इसके बाद मां पार्वती ने स्वंय शक्ति संधान किया। इस तेज ने मां कालरात्रि को उत्पन्न किया। इसके बाद जब मां दुर्गा ने दैत्य रक्तबीज का अंत किया और उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को मां कालरात्रि ने जमीन पर गिरने से पहले ही अपने मुख में भर लिया। इस तरह से देवी मां ने सबका गला काटते हुए दानव रक्तबीज का अंत किया। रक्तबीज का वध करने वाला माता पार्वती का यह रूप कालरात्रि कहलाया।

मां कालरात्रि देखने में बहुत ही भंयकर है लेकिन इनका हृदय बहुत ही कोमल है। इनकी नाक से आग की भयंकर लपटें निकलती हैं। मां कालरात्रि की सवारी गर्धव यानि गधा है। मां कालरात्रि का दायां हाथ हमेशा उपर की ओर उठा रहता है, इसका अर्थ मां सभी को आशीर्वाद दे रही हैं। मां कालरात्रि के निचले दाहिने हाथ की मुद्रा भक्तों के भय को दूर करने वाली है। उनके बाएं हाथ में लोहे का कांटेदार अस्त्र है। निचले बाएं हाथ में कटार है।

रात्रि में की जाती है विशेष पूजा


मां कालरात्रि की विशेष पूजा रात्रि में करने का विधान है. तांत्रिक अपनी मंत्र साधना के लिए इस दिन का वर्ष भर इंतजार करते हैं. मान्यता है कि इस दिन मंत्र सिद्ध होते हैं.इसीलिए सप्तमी की रात्रि सिद्धियों की रात भी कही गई है. मां कालरात्रि की पूजा रात्रि में की जाती है विशेष पूजा

आरंभ करने से पहले कुमकुम, लाल पुष्प, रोली लगाएं. माला के रूप में मां को नींबुओं की माला पहनाएं और उनके आगे तेल का दीपक जलाएं। मां को लाल फूल अर्पित करें। साथ ही गुड़ का भोग लगाएं। इसके बाद मां के मन्त्रों का जाप  या सप्तशती का पाठ करें। इस दिन मां की पूजा के बाद शिव और ब्रह्मा जी की पूजा की जाती है।

मां कालरात्रि का मंत्र


1- या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।


2- ॐ कालरात्रि देव्ये नम:


3- ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे


माँ कालरात्रि की आरती

कालरात्रि जय जय महाकाली
काल के मुंह से बचाने वाली

दुष्ट संहारिणी नाम तुम्हारा
महा चंडी तेरा अवतारा
पृथ्वी और आकाश पर सारा
महाकाली है तेरा पसारा
खंडा खप्पर रखने वाली
दुष्टों का लहू चखने वाली
कलकत्ता स्थान तुम्हारा
सब जगह देखूं तेरा नजारा
सभी देवता सब नर नारी
गावे स्तुति सभी तुम्हारी
रक्तदंता और अन्नपूर्णा
कृपा करे तो कोई भी दुःख ना
ना कोई चिंता रहे ना बीमारी
ना कोई गम ना संकट भारी
उस पर कभी कष्ट ना आवे
महाकाली मां जिसे बचावे
तू भी 'भक्त' प्रेम से कह
कालरात्रि मां तेरी जय

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