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Durga Visarjan 2026: मां दुर्गा को विदाई देने की परंपरा क्यों है खास? जानिए विसर्जन का धार्मिक महत्व

Durga Visarjan 2026: मां दुर्गा को विदाई देने की परंपरा क्यों है खास? जानिए विसर्जन का धार्मिक महत्व
विजयादशमी पर मां दुर्गा को दी जाती है विदाई, पंचतत्व में विलीन होने और कैलाश लौटने की मान्यता से जुड़ी है विसर्जन की परंपरा

Durga Visarjan 2026:  शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों तक मां दुर्गा की विधि-विधान से पूजा-अर्चना करने के बाद विजयादशमी के दिन प्रतिमा विसर्जन की परंपरा निभाई जाती है। इस दौरान श्रद्धालु ढोल-नगाड़ों, जयकारों और भक्ति गीतों के बीच मां दुर्गा को भावभीनी विदाई देते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन विशेष रूप से जल में ही क्यों किया जाता है? इसके पीछे हिंदू धर्म की कई धार्मिक मान्यताएं और पौराणिक परंपराएं प्रचलित हैं।

पंचतत्व में विलीन होने का प्रतीक है विसर्जन

हिंदू धर्म में प्रकृति और पंचतत्व का विशेष महत्व माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से ही सृष्टि की रचना हुई है। मां दुर्गा की मिट्टी से निर्मित प्रतिमा भी प्रकृति के इसी स्वरूप का प्रतीक मानी जाती है। पूजा-अर्चना और प्राण-प्रतिष्ठा के बाद प्रतिमा को देवी के आराध्य स्वरूप के रूप में पूजित किया जाता है।

नवरात्रि के समापन पर प्रतिमा विसर्जन को प्रकृति में वापस लौटने का प्रतीक माना जाता है। इस परंपरा के माध्यम से यह संदेश दिया जाता है कि प्रकृति से उत्पन्न प्रत्येक वस्तु अंततः उसी में विलीन हो जाती है।

मां दुर्गा के कैलाश लौटने से जुड़ी मान्यता

एक प्रचलित पौराणिक मान्यता के अनुसार, नवरात्रि के नौ दिनों में मां दुर्गा अपने मायके यानी धरती लोक पर आती हैं। भक्त उन्हें परिवार की बेटी की तरह मानकर स्वागत करते हैं और पूरे नौ दिनों तक उनकी सेवा तथा पूजा करते हैं। विजयादशमी के दिन मां को विदाई दी जाती है।

मान्यता है कि मां दुर्गा इसके बाद भगवान शिव के निवास स्थान कैलाश पर्वत लौट जाती हैं। इसी विश्वास के साथ श्रद्धालु प्रतिमा का विसर्जन कर मां को विदाई देते हैं। यह परंपरा भक्तों के लिए भावनात्मक और आध्यात्मिक महत्व रखती है।

सनातन परंपरा में जल का विशेष महत्व

सनातन धर्म में जल को जीवन, पवित्रता और शुद्धता का प्रतीक माना गया है। नदियों और जलस्रोतों का धार्मिक अनुष्ठानों में विशेष स्थान है। इसी कारण प्रतिमा विसर्जन के लिए जल को महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, जल में विसर्जन देवी के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने और सृष्टि के साथ उनके आध्यात्मिक संबंध को स्वीकार करने का प्रतीक है। हालांकि, प्रतिमा विसर्जन से जुड़ी परंपराओं और रीति-रिवाजों में क्षेत्र के अनुसार अंतर भी देखने को मिलता है।

गणेश जी की कथा से भी जोड़ी जाती है परंपरा

कुछ प्रचलित धार्मिक कथाओं में प्रतिमा विसर्जन की परंपरा को महर्षि वेदव्यास और भगवान गणेश से जुड़ी कथा के संदर्भ में भी समझाया जाता है। मान्यता है कि महाभारत की रचना के दौरान लगातार लेखन करने से भगवान गणेश थक गए थे। इसके बाद उन्हें शीतलता प्रदान करने के लिए जल का सहारा लिया गया।

हालांकि, इस कथा को दुर्गा प्रतिमा विसर्जन की परंपरा से जोड़ने वाली मान्यता सर्वमान्य ऐतिहासिक तथ्य नहीं, बल्कि धार्मिक आख्यानों में प्रचलित एक व्याख्या है।

विसर्जन के साथ अगले वर्ष आने की कामना

मां दुर्गा का विसर्जन भक्तों के लिए केवल विदाई का अवसर नहीं, बल्कि अगले वर्ष उनके पुनः आगमन की प्रतीक्षा का प्रतीक भी है। विसर्जन के दौरान श्रद्धालु ‘अगले बरस फिर आना’ के जयकारे लगाते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि, शांति तथा खुशहाली की कामना करते हैं।

इस प्रकार दुर्गा विसर्जन की परंपरा आस्था, प्रकृति के प्रति सम्मान और जीवन के चक्र का संदेश देती है। साथ ही, पर्यावरण की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए प्रतिमा विसर्जन के लिए प्राकृतिक और पर्यावरण-अनुकूल सामग्री का उपयोग करना तथा प्रशासन द्वारा निर्धारित विसर्जन स्थलों और दिशा-निर्देशों का पालन करना भी जरूरी है।

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