क्या आपको भी है मंगल दोष तो यहां करें पूजा, मत्स्य पुराण में भी है इस मंदिर का जिक्र
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पुराणों में मंगल ग्रह का जन्म स्थान उज्जैन में माना गया है। इसलिए मंगल ग्रह की शांति के लिए यथा संभव अंगारेश्वर महादेव में विशेष पूजा फलदायी मानी गई है। धार्मिक मान्यता है कि इस पूजा से मंगल ग्रह दोष की शांति होती है और विवाह योग्य युवक-युवतियों के विवाह में मांगलिक दोषों के कारण आ रही समस्याएं हल हो जाती है।

 

उज्जैन के 84 महादेव में शामिल अंगारेश्वर महादेव मंदिर का स्कंद पुराण के अवंतिका खंड में उल्लेख है। पंडित मनीष उपाध्याय के मुताबिक इसका धार्मिक महत्व है।  मान्यता है कि यहां दर्शन करने मात्र से मंगल दोष दूर होते हैं।  उज्जैन में स्थित अंगारेश्वर महादेव मंदिर का जिक्र मत्स्य पुराण में भी मिलता है। साथ ही अंगारेश्वर महादेव को ही मंगलनाथ भी कहा जाता है।

 

 

ऐसा माना जाता है कि Angareshwar Temple दुनिया का एकमात्र ऐसा मंदिर है, जिस पर मंगल ग्रह की सीधी किरणें पड़ती है। साथ ही धरती की कर्क रेखा भी यहीं से गुजरती है। शिप्रा नदी के तट पर स्थित अंगारेश्वर मंदिर को ही मंगल ग्रह का जन्म स्थान माना गया है।

 

 

 

 इसके अलावा मंगलवार को पूजन करने पर कार्य में रुकवट खत्म होती है। अंगारेश्वर मंदिर की विशेषता है कि दीपावली के बाद आने वाले मंगलवार को विशेष रुप से अन्नकूट लगता है। मंदिर के पुजारी रोहित के मुताबिक दूर-दूर से श्रद्धालु मंगलवार को दर्शन करने के लिए आते हैं और मंगल के दोषों से मुक्ति पाते हैं। 

मत्स्य पुराण में उल्लेखित इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में मंगल भारी हो तो अंगारेश्वर महादेव मंदिर में पूरे विधि-विधान से पूजन करने पर उन्हें लाभ होता है। वास्तव में अंगारेश्वर मंदिर में भगवान शिव ही मंगलनाथ के रूप में विराजमान हैं। मंगलनाथ मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां होने वाली भात पूजा है, जिसमें शामिल होने के लिए बड़ी संख्या में भक्त दूर दूर से आते हैं।

पौराणिक मान्यता है कि मंगल नाथ धरती माता के ही पुत्र हैं। इस संबंध में एक पौराणिक कथा का भी जिक्र मिलता है, जिसमें बताया गया है कि पुरातन काल में अंधकासुर नाम के दैत्य को भगवान से वरदान मिला था कि उसके रक्त से सैकड़ों दैत्य जन्म लेंगे। वर मिलने के बाद दैत्य ने उज्जैन में तबाही मचा दी। भक्तों की प्रार्थना पर भगवान भोलेनाथ खुद अंधकासुर का संहार करने के लिए आए।

युद्ध करते-करते भगवान शिव का पसीना बहने लगा और भगवान शिव के पसीने की बूंद धरती पर गिरी और उसी से मंगल ग्रह का जन्म हुआ। इसके बाद मंगल ग्रह ने दैत्य के शरीर से गिरी रक्त की सारी बूंदों को सोख लिया, जिस कारण से मंगल ग्रह लाल हो गया।

43वें महादेव लिंग अंगारेश्वर (मंगल ग्रह के आधिपत्य) पौराणिक कथा 

एक कथा के अनुसार देवाधिदेव भगवान शंकर से एक समय पार्वती जी का वार्तालाप हो रहा था। इसी चर्चा के दौरान पार्वती जी ने भगवान शंकर से पूछा की उन्हें मंगलकारी अंगारक के जन्म के बारे में जानने की बहुत इच्छा हैं। तब देवाधिदेव भगवान शंकर ने पार्वती जी से कहा की हे पर्वत की कन्या उज्जैन में तिरालीसवां ज्योतिर्लिंग अंगारेश्वर का हैं जिनके दर्शन मात्र से सर्व सम्पदा प्राप्त होती हैं।

पूर्व समय में लाल शरीर की शोभवाला और टेड़े शरीर वाला क्रोध से युक्त यह बालक मेरे द्वारा ही उत्पन्न हुआ में ने उसे पृथ्वी पर रख दिया इसलिए उसका नाम भूमि पुत्र हुआ। पैदा होते ही स्थूल शरीर वाला वह बालक भय देने लगा। उसके कोप से पृथ्वी कम्पित होने लगी। मनुष्य और देवतादि सब दुखी हो गए। समुद्रों में तूफान आने लगी। पर्वत हिलने लगे। उसी के प्रभाव स्वरूप देवता मनुष्य आदि परेशान होने लगे।

अंत में परेशान होकर सभी ऋषि देवता इंद्रा सभी देवगुरु वृहस्पति के पास गए और उनसे चर्चा कर उन्हें अपने साथ लेकर ब्रह्मलोक गए। और पितामह ब्रह्मा जी को सारा वृतांत सुनाया की किस प्रकार भगवान शंकर के शरीर से बालक का जन्म हुआ और उत्पन्न होने के कुछ ही समय में उसने तीनो लोकों का भ्रमण कर डाला। अनेकों का भक्षण कर लिया और सभी को परेशान कर दिया।

सभी की बातें सुनकर प्रजापिता ब्रह्मा जी ने मुझसे कैलाश पर्वत पर आकर मिलाने का निर्णय किया। मेरे पास आकर सभी ने भय पूरक मेरे शरीर से उत्पन्न उस बालक के क्रिया कलापों का वर्णन किया की किस प्रकार उस बालक ने सभी को डरा दिया और अनेकों का भक्षण कर लिया।

यह सुनकर मेने उस बालक को बुलाया और उससे पूछा की ऐसा क्यों कर रहे हो। तब उस बालक ने कहा की प्रभु में कौन सा काम करूं। मेने उसे समझाया की जगत को त्रास मत दो। ऐसा कहकर मेने उसे बार-बार समझाया। मेने उसे कहा की मेरे शरीर की राजस प्रकृति से तुम्हारा जन्म हुआ हैं।

इसीलिए तुम्हारा नाम अंगारक हुआ हैं तुम लोगो का मंगल करो,उन्हें प्रसन्न और आनंदित रखो यही तुम्हारा कर्म हैं। इस समय तुमसे भूलवश वक्री कार्य हुए हैं इसलिए विद्वान लोग तुम्हें वक्र नाम से पुकारेंगे।

इस प्रकार मेरे समझाने पर उस बालक ने पूछा की बिना आहार के मेरी तृप्ति कैसे होगी। उसने कहा की हे देवाधिदेव आप मुझे अच्छा स्थान दो,स्वामित्व दो,शक्ति दो और आहार भी जल्दी से दे दो। उस पुत्र के ऐसे वचन सुनकर मेने सोचा की यह बालक हैं और प्रिय भी हैं ऐसा विचार कर उत्तम स्थान अक्षय देना चाहिए। 

यह सोचकर मेने उसे अपनी गोद में बिठा लिया और प्रेम से कहा की हे पुत्र मेने तुझे महाकाल वन (उज्जैन नगरी) में गंगेश्वर से पूर्व में स्थान दिया हैं। उस स्थान पर शिप्र और खगर्ता का शुभ संगम हुआ हैं।

जब मेने गंगा को मस्तक पर धारण किया था उस समय वह गुस्से से चन्द्र मंडल से नीचे गिरी थी तब वह महाकाल वन क्षेत्र में गिरी थी उस समय गंगा आकाश से नीचे आई थी इसीलिए उसका नाम खगर्ता हुआ और इसीलिए मेने वहां पर अवतार लिया में यहां पर लिंग (महादेव) के रूप में निवास करता हूं।

मंगलनाथ मंदिर के दर्शन  – Timing of Mangalnath Temple in Hindi

और सभी देवतादिक मेरी पूजा करते हैं। यह स्थान देवतों को भी दुर्लभ हैं अत: हैं प्रिय पुत्र तुम शीघ्र वहां के लिए प्रस्थान करो और उस संगम पर मेरी पूजा करो वह संगम का स्थल तुम्हारे नाम से जग में प्रसिद्द होगा और ग्रहों के बीच में तेरा आधिपत्य होगा। तुझे मैं ने तीसरा स्थान दिया हैं।

वहां तुम्हें तृप्ति प्राप्त होगी। ग्रहों के बीच तुम्हारी पूजा होगी और तिथियों में मैं ने तुम्हें चतुर्थी तिथि प्रदान की हैं, इस चतुर्थी को जो भी तुम्हारी प्रसन्नता के लिए व्रत, शांति दक्षिणा सहित पूजन करेंगे उससे तुम्हें तृप्ति होगी, भोजन मिलेगा और मैं ने तुम्हें वार मंगलवार दिया हैं जिससे सभी को मंगल की प्राप्ति होगी। जो भी मनुष्य मंगलवार को विद्यारम्भ करेगा, नए वस्त्राभूषण धारण करेगा या फिर शरीर पर तेल लगाएगा उसे इस सभी कर्मो का फल नहीं मिलेगा।

मंगलनाथ मंदिर का प्रवेश शुल्क – Entry fee of Mangalnath Temple in Hindi

मेरी कही बातें सुनकर उस वक्रांग मंगल पुत्र ने स्वीकार कर ली और उसका नाम अंगारकेश्वर हो गया और इस प्रकार मेरे वचन अनुसार वह अवंतिकापुरी (वर्तमान उज्जैन,मध्यप्रदेश) में अवस्थित हो गया। उस वक्रांग मंगल पुत्र ने जब शिप्रा जी के पावन तट पर रमणीय खगर्ता नदी के संगम पर मुझे लिंग रूप में देखा तो तो वह परम शांति को प्राप्त हो गया और मेने उसे देखकर आलिंगन किया,

उसे आशीर्वाद दिया की हैं पुत्र तेरे सभी वांछित कार्य पूर्ण होंगे। हैं मंगल में तुझ से प्रसन्न हुं। आज से तेरा नाम अंगारकेश्वर तीनो लोकों में प्रसिद्द होगा इसमें कोई संशय नहीं हैं जो कोई भी मेरे दर्शन प्रतिदिन इस संमेश्वर के पास करेगा उसका इस पृथ्वी पर पुन: जन्म नहीं होगा। 

जो मेरा पूजन मंगलवार के दिन इस अंगारकेश्वर पर करेंगे वह इस कलियुग में कृतार्थ हो जायेगा इसमें कोई संशय नहीं हैं जो लोग मंगलवार की चतुर्थी को मेरा व्रत, पूजन और दर्शन करेंगे वह इस घोर दुखों युक्त संसार में पुन: जन्म नहीं लेंगे।

तुम मनुष्य मात्र की कुंडलियों में योग कारक रहोगे। योग की अनुकूलता के लिए जो व्यक्ति यहां आकर तुम्हारी पूजा करेगा, उसका मंगल होगा। तभी से लोग मंगल की पूजा के लिए उज्जैन में आते हैं और अपनी श्रद्धा अनुसार अंगारेश्वर महादेव मंदिर में पूजा करके मंगल की अनुकूलता प्राप्त करते हैं।

मंगलनाथ मंदिर उज्जैन घूमने जाने का सबसे अच्छा समय – Best time to visit Mangalnath Temple Ujjain in Hindi

जब मंगलवार को अमावस्या हो तब खगर्ता संगम पर देवता पूजित हैं उस दिन यहां दर्शन और पूजा-स्नान से वाराणसी,प्रयाग, गयाजी और करुक्षेत्र में एवं पुष्कर में स्नान-पूजन का जो पुण्य मिलता हैं उससे भी अधिक पुण्य फल यहां पूजन और दर्शन से प्राप्त होगा

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