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Bombay High court: तलाक से पहले पति का घर छोड़ने वाली महिला दोबारा वहां रहने का अधिकार खो देती है- बॉम्बे हाईकोर्ट

Bombay High court: तलाक से पहले पति का घर छोड़ने वाली महिला दोबारा वहां रहने का अधिकार खो देती है- बॉम्बे हाईकोर्ट

जस्टिस मोरे ने फैसला सुनाया कि घरेलू हिंसा अधिनियम के सेक्शन 17 के तहत, निवास के अधिकार की अनुमति केवल तभी दी जाती है जब महिला तलाक से पहले साझा (पति के) घर में रहती है।

 

औरंगाबाद: तलाक के लिए अपने पति का घर छोड़ने वाली महिला बाद में ससुराल में रहने का अधिकार भी खो देती है। भले ही तलाक के खिलाफ उसकी याचिका घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम 2005 के तहत लंबित हो। बॉम्बे उच्च न्यायालय की औरंगाबाद बेंच ने यह फैसला सुनाया ।

 

न्यायमूर्ति संदीपकुमार सी.मोरे की पीठ ने महिला की ससुराल पक्ष की याचिका को बरकरार रखते हुए निचली अदालत के उस आदेश को खारिज कर दिया जिसमें उसे अपने घर में स्नान, शौचालय, बिजली वगैरह के उपयोग के साथ-साथ निवास का पूरा अधिकार दिया गया था।

 

उमाकांत एच. बोंद्रे और उनकी पत्नी शोभा ने अडिशनल सेशन जज, उदगीर कोर्ट के फरवरी 2018 के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका दायर की थी। कोर्ट ने उनकी पूर्व बहू साक्षी बोंड्रे को निवास का अधिकार दिया था जबकि उसने अपने पति सूरज बोंड्रे से तलाक ले लिया था। इस जोड़े की शादी जून 2015 में हुई थी।

 

 लेकिन एक साल बाद, उनके बीच विवादों के बाद, साक्षी ससुराल छोड़कर अपने माता-पिता के साथ रहने चली गई।

 


लोअर कोर्ट के फैसले को चुनौती
नवंबर 2017 में, एक उदगीर मैजिस्ट्रेट ने उन्हें वैकल्पिक आवास व्यवस्था करने के लिए 2,000 रुपये प्रति माह और अतिरिक्त 1,500 रुपये प्रति माह का अंतरिम रखरखाव का आदेश दिया था। अपनी याचिका में, वरिष्ठ बोंद्रे दंपति ने निचली अदालत के आदेशों पर सवाल उठाया था।

जबकि जब घर उमाकांत एच. बोंद्रे (ससुर) के नाम पर था और तलाक (जुलाई 2018 में मंजूर की गई) के खिलाफ साक्षी बोंद्रे की याचिका पहले हाई कोर्ट के समक्ष लंबित है।

जस्टिस मोरे ने फैसला सुनाया कि घरेलू हिंसा अधिनियम के सेक्शन 17 के अनुसार निवास के अधिकार की अनुमति केवल तभी दी जा सकती है, जब महिला तलाक से पहले साझा (पति के) घर में रहती है। ऐसे में साक्षी बोंद्रे पहले के निवास आदेश का सहारा नहीं ले सकतीं, जब उनकी शादी हाई कोर्ट से पारित तलाक की डिक्री की ओर से भंग कर दी गई थी, और विशेष रूप से तब जब उन्होंने चार साल पहले ही अपने साझा घर को छोड़ दिया था।



तलाक से बहुत पहले छोड़ दिया था ससुराल
न्यायाधीश ने कहा, ‘इन परिस्थितियों में, वह बेदखली को रोकने की राहत की भी हकदार नहीं है क्योंकि वह साझा घर के पोजेशन में नहीं है।’

साक्षी बोंड्रे के वकीलों ने दलील दी थी कि तलाक की डिक्री को उनकी अपील में इस आधार पर चुनौती दी गई थी कि यह धोखाधड़ी से प्राप्त किया गया था और याचिका अदालत के समक्ष लंबित है।



साक्षी की दलीलों को खारिज करते हुए, जस्टिस मोरे ने कहा कि उन्होंने तलाक से बहुत पहले अपना वैवाहिक घर छोड़ दिया था और यह इंगित करने के लिए रिकॉर्ड पर कोई भी सामग्री पेश करने में विफल रही कि उसे उनके पति या ससुराल वालों ने जबरन बेदखल किया था।

जस्टिस मोरे ने फैसला सुनाते हुए कहा, ‘इसलिए, उनकी अपील की पेंडेंसी उनके ससुराल वालों के आवेदनों के रास्ते में नहीं आएगी, जो निचली अदालत के आदेशों को चुनौती देती है, जिसमें उन्हें निवास का अधिकार दिया गया था।'

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