×

एक ही फॉर्मूले की दवाओं की कीमतों में अंतर क्यों? मरीजों की जेब पर कितना पड़ता है असर

एक ही फॉर्मूले की दवाओं की कीमतों में क्यों होता है अंतर? जानिए महंगी और सस्ती दवाओं का पूरा गणित

एक ही फॉर्मूले की दवाओं की कीमतों में क्यों होता है अंतर? जानिए महंगी और सस्ती दवाओं का पूरा गणित

वाराणसी। बीमारी के इलाज में मरीजों को डॉक्टर की फीस और जांच के साथ दवाओं पर भी अच्छी-खासी रकम खर्च करनी पड़ती है। कई बार बाजार में एक ही सक्रिय घटक (सॉल्ट), समान ताकत और समान प्रकार की दवा अलग-अलग कंपनियों के ब्रांड नाम से अलग-अलग कीमतों पर मिलती है।

ऐसे में मरीजों के मन में सवाल उठता है कि जब दवा का फॉर्मूला एक जैसा है, तो उसकी कीमत में इतना अंतर क्यों है? क्या महंगी दवा ज्यादा असरदार होती है या कम कीमत वाली दवा भी उतनी ही उपयोगी हो सकती है?

दरअसल, दवाओं की कीमत केवल उनके फॉर्मूले से तय नहीं होती। इसमें कंपनी की उत्पादन लागत, ब्रांड की पहचान, मार्केटिंग, पैकेजिंग और वितरण व्यवस्था जैसे कई कारक भूमिका निभाते हैं। भारत में दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण के लिए औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश (DPCO), 2013 लागू है।

इसके तहत राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (NPPA) आवश्यक दवाओं की निर्धारित श्रेणियों के लिए अधिकतम कीमत तय करता है। हालांकि, मूल्य नियंत्रण के दायरे और नियमों के अनुसार अलग-अलग ब्रांड की कीमतों में अंतर हो सकता है।

 

ब्रांड नाम और मार्केटिंग से भी प्रभावित होती है कीमत

एक ही सक्रिय घटक वाली दवा को अलग-अलग कंपनियां अपने ब्रांड नाम से बाजार में बेचती हैं। कुछ कंपनियां डॉक्टरों और मेडिकल स्टोर तक अपने उत्पाद की पहुंच बनाने के लिए मार्केटिंग और प्रचार पर अधिक खर्च करती हैं। इसके अलावा पैकेजिंग, वितरण और व्यावसायिक रणनीति भी कीमत को प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि समान सॉल्ट और ताकत वाली दवाओं के दाम अलग-अलग दिखाई देते हैं।

हालांकि, किसी दवा की कीमत अधिक होने का यह प्रमाण नहीं है कि वह दूसरी समान दवा से ज्यादा असरदार है। इसी तरह कम कीमत का मतलब यह भी नहीं कि दवा की गुणवत्ता खराब है। दवा की उपयोगिता और गुणवत्ता का आकलन केवल उसके ब्रांड या कीमत के आधार पर नहीं किया जा सकता।

 

लंबे इलाज में बढ़ जाता है दवाओं का खर्च

मधुमेह, उच्च रक्तचाप और अन्य दीर्घकालिक बीमारियों से पीड़ित मरीजों को नियमित रूप से दवाएं लेनी पड़ती हैं। ऐसे में हर महीने दवाओं पर होने वाला खर्च सालभर में बड़ी रकम बन सकता है। यदि किसी दवा के एक पैक की कीमत 300 रुपये है और उसी सक्रिय घटक, ताकत और उपयुक्त खुराक वाला विकल्प 150 रुपये में उपलब्ध है, तो एक पैक पर 150 रुपये की बचत हो सकती है। महीने में एक पैक खरीदने पर सालभर में यह अंतर 1,800 रुपये तक पहुंच सकता है।

यह केवल समझाने के लिए दिया गया काल्पनिक उदाहरण है। वास्तविक कीमत और बचत दवा, पैक के आकार तथा बाजार में उपलब्ध विकल्पों पर निर्भर करती है।

जेनेरिक दवाओं से कम हो सकता है खर्च

जेनेरिक दवाएं मरीजों के लिए किफायती विकल्प हो सकती हैं। केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री भारतीय जनऔषधि परियोजना के तहत जनऔषधि केंद्रों पर कम कीमत में गुणवत्तापूर्ण जेनेरिक दवाएं उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है। मरीज इन केंद्रों पर उपलब्ध दवाओं और उनकी कीमतों की जानकारी आधिकारिक जनऔषधि वेबसाइट के माध्यम से भी प्राप्त कर सकते हैं।

हालांकि, केवल कम कीमत देखकर अपनी निर्धारित दवा बदलना उचित नहीं है। दवा का सक्रिय घटक, उसकी ताकत, खुराक, टैबलेट या कैप्सूल का स्वरूप और मरीज की स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है। किसी दूसरे ब्रांड या जेनेरिक विकल्प को अपनाने से पहले डॉक्टर या योग्य फार्मासिस्ट से सलाह लेनी चाहिए।

दवा खरीदते समय इन बातों का रखें ध्यान

दवा के पैकेट पर सक्रिय घटक, ताकत और खुराक की जानकारी जरूर देखें। पैक पर दर्ज अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) जांचें और खरीदारी का बिल लें। डॉक्टर से पूछें कि क्या उसी सॉल्ट और ताकत का कोई किफायती विकल्प उपलब्ध है। दवा की एक्सपायरी डेट, पैकेजिंग और निर्माता का विवरण जांचें। बिना चिकित्सकीय सलाह के दवा बंद न करें और न ही उसका ब्रांड बदलें। यदि किसी दवा की कीमत निर्धारित सीमा से अधिक वसूली जा रही है, तो NPPA के समक्ष शिकायत करने की जानकारी प्राप्त करें।

दवाओं की कीमतों पर निगरानी रखता है NPPA

राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण दवाओं की कीमतों से जुड़े नियमों के अनुपालन की निगरानी करता है। निर्धारित मूल्य सीमा से अधिक कीमत वसूलने या मूल्य नियंत्रण संबंधी नियमों का उल्लंघन होने पर संबंधित कंपनी के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। दवाओं की कीमतों और मूल्य निर्धारण से जुड़े आदेशों की जानकारी NPPA की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध है।

सही जानकारी से बच सकता है अतिरिक्त खर्च

दवाओं की कीमतों में अंतर के कारणों को समझना मरीजों के लिए जरूरी है। महंगी दवा को हमेशा बेहतर और सस्ती दवा को कम प्रभावी मानना सही नहीं है। डॉक्टर से किफायती विकल्पों के बारे में जानकारी लेना, दवाओं की कीमतों की तुलना करना और सरकारी जनऔषधि केंद्रों की सुविधा का लाभ उठाना इलाज का खर्च कम करने में मददगार हो सकता है। हालांकि, दवा की गुणवत्ता और चिकित्सकीय उपयुक्तता से समझौता किए बिना ही कोई विकल्प चुनना चाहिए।

Share this story