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निजी मेडिकल कॉलेजों का छात्रों से बॉन्ड मांगना परेशान करने वाला : सुप्रीम कोर्ट
supreme court ने टू-फिंगर टेस्ट पर रोक लगाई- Breaking news

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक निजी मेडिकल कॉलेज को एक स्नातकोत्तर छात्रा को अपना कोर्स पूरा करने के बाद अनिवार्य सेवा के बदले पांच लाख का भुगतान करने के लिए मजबूर करने के लिए फटकार लगाई।

 

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक निजी मेडिकल कॉलेज को एक स्नातकोत्तर छात्रा को अपना कोर्स पूरा करने के बाद अनिवार्य सेवा के बदले पांच लाख का भुगतान करने के लिए मजबूर करने के लिए फटकार लगाई।

 

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की एकल पीठ ने साल 2020 में माना था कि अपीलकर्ता कॉलेज का मूल दस्तावेजों और याचिकाकर्ता के प्रमाण पत्र को तब तक जारी करने से इनकार करना जब तक कि वो बॉन्ड का पैसा जमा ना कर दे "कानून में अस्थिर" था इसलिए मेडिकल कॉलेज को 30 दिनों की अवधि के भीतर ब्याज सहित राशि वापस करने का निर्देश दिया गया था।


हाईकोर्ट की एक डिवीजन बेंच ने अपील में रिट अदालत के फैसले को बरकरार रखा था। इस फैसले के खिलाफ निजी मेडिकल कॉलेज ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपील दायर की। मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस हिमा कोहली मामले की सुनवाई कर रहे थे।

इससे पहले कि मेडिकल कॉलेज के वकील कोई दलील पेश करते मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने कहा, "मैं हैरान था। आप बॉन्ड कैसे मांग सकते हैं? आप एक निजी संस्थान हैं। केवल सरकार ही बॉन्ड मांग सकती है क्योंकि वे मेडिकल शिक्षा को सब्सिडी देते हैं। जबकि एक निजी मेडिकल कॉलेज करोड़ों रुपये चार्ज करेगा। इसलिए, वे कह सकते हैं कि अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद आप एक बॉन्ड भर सकते हैं।"



वकील ने समझाने का प्रयास किया, "हम भी केवल सात लाख वसूल रहे हैं।" मुख्य न्यायाधीश ने आगे कहा, "लेकिन आपने किस अधिकार के तहत बॉन्ड मांगा था कि वह पांच लाख का भुगतान करे?"

वकील ने जवाब देते हुए कहा, "यह एक शर्त थी। उसे एक विकल्प दिया गया था।" मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ ने पूछा, 'हमें पॉवर दिखाइए। यदि आपके पास पॉवर नहीं है तो आपको पैसा वापस करना होगा।" उन्होंने अविश्वास व्यक्त करते हुए कहा, "यदि निजी चिकित्सा शिक्षण संस्थान अब बॉन्ड मांगने लगे कि आपको हमारे कॉलेज में हमें सेवा देनी होगी, अन्यथा आपको पांच लाख का भुगतान करना होगा।


 


"ऐसा इसलिए था, क्योंकि सीनियर रेजीडेंसी के स्तर पर, उज्जैन जैसी जगह में कोई भी उस पद को नहीं लेता। यही कारण है," वकील ने फिर से समझाने की कोशिश की। हालांकि जज स्पष्टीकरण से प्रभावित नहीं हुए।

मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट रूप से कहा, "लेकिन आप ऐसा नहीं कर सकते। आपके पास बॉन्ड मांगने की कोई शक्ति नहीं है। आप सरकार नहीं हैं। सरकार मेडिकल छात्रों से बॉन्ड मांग सकती है, और वे ऐसा इन-सर्विस डॉक्टरों से करते हैं, क्योंकि वे कुछ लाभ दे रहे हैं। वे कह सकते हैं कि आपको हमारे सार्वजनिक अस्पतालों की सेवा जारी रखनी होगी।"

" प्रक्रियात्मक कठिनाइयों" का हवाला देते हुए जैसे आदेश को देर से अपलोड किया जाना,

वकील ने पीठ से आठ प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से ब्याज के भुगतान के संबंध में हाईकोर्ट के निर्देश को रद्द करने का भी अनुरोध किया। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने दृढ़ता से कहा, "नहीं, यह संभव नहीं होगा। छात्र ब्याज का हकदार है। पैसा गलत तरीके से रखा गया है।"

अगस्त 2019 में, सुप्रीम कोर्ट ने पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल कोर्स और सुपर स्पेशियलिटी कोर्स में प्रवेश के लिए निष्पादित किए जाने वाले अनिवार्य बॉन्ड को लागू करने के खिलाफ एक चुनौती को खारिज कर दिया था।

जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस हेमंत गुप्ता की पीठ ने चुनौती को खारिज करते हुए कहा कि कुछ राज्य सरकारों के पास अनिवार्य बॉन्ड में कठोर शर्तें थीं और सरकारी संस्थानों में प्रशिक्षित डॉक्टरों द्वारा प्रदान की जाने वाली अनिवार्य सेवा पर एक समान नीति की घोषणा का सुझाव दिया जो सभी राज्यों में लागू हो।

इस साल अगस्त में सुप्रीम कोर्ट ने एमबीबीएस छात्रों द्वारा पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल कोर्स में अनिवार्य बॉन्ड शर्तों को रद्द करने की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया और याचिकाकर्ताओं को बॉम्बे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने का निर्देश दिया।

मिंट ने रिपोर्ट किया है कि विशेष रूप से केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय डॉक्टरों के लिए बॉन्ड नीति को दूर करने के लिए दिशानिर्देश बना रहा है, जिसके लिए उन्हें ग्रेजुएट और पोस्ट ग्रेजुएट के बाद एक राज्य द्वारा संचालित अस्पताल में एक निर्दिष्ट अवधि के लिए काम करने की आवश्यकता होगी।

केस : रुक्समणिबेन दीपचंद गार्डी मेडिकल कॉलेज बनाम अंशुल जैन व अन्य।


 

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