बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता असरानी का 84 वर्ष की उम्र में निधन, ‘शोले’ के जेलर के किरदार ने दिलाई थी खास पहचान
मुंबई। हिंदी सिनेमा के मशहूर हास्य अभिनेता गोवर्धन असरानी का 84 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। उन्होंने सोमवार शाम मुंबई के जुहू स्थित आरोग्य निधि अस्पताल में अंतिम सांस ली। बताया गया कि वह पिछले करीब पांच दिनों से अस्पताल में भर्ती थे और उनकी तबीयत ठीक नहीं थी। सोमवार शाम सांताक्रूज श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार किया गया, जिसमें परिवार के सदस्यों और करीबी लोगों ने हिस्सा लिया।

असरानी के निधन की खबर से हिंदी फिल्म जगत में शोक की लहर है। अपनी सहज कॉमेडी, चेहरे के हाव-भाव और संवाद बोलने के अनोखे अंदाज से उन्होंने कई पीढ़ियों के दर्शकों का मनोरंजन किया। पांच दशक से अधिक के फिल्मी सफर में उन्होंने 350 से ज्यादा फिल्मों में अभिनय किया और सहायक भूमिकाओं को भी अपनी अलग पहचान दी।
‘शोले’ के जेलर का किरदार आज भी यादगार

असरानी के करियर की सबसे चर्चित भूमिकाओं में फिल्म ‘शोले’ का जेलर शामिल है। इस किरदार में उनके अभिनय और संवादों ने दर्शकों पर गहरी छाप छोड़ी। कॉमेडी के क्षेत्र में उनकी खास पहचान रही, लेकिन उन्होंने गंभीर और भावनात्मक भूमिकाओं में भी अपनी प्रतिभा दिखाई।
‘मेरे अपने’, ‘बावर्ची’, ‘परिचय’, ‘अभिमान’, ‘चुपके-चुपके’, ‘छोटी सी बात’ और ‘रफू चक्कर’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय को सराहा गया। बाद के वर्षों में वह ‘भूल भुलैया’, ‘धमाल’, ‘ऑल द बेस्ट’, ‘वेलकम’, ‘आर… राजकुमार’ और ‘बंटी और बबली 2’ जैसी फिल्मों में भी नजर आए।
जयपुर से शुरू हुआ था फिल्मी सफर
गोवर्धन असरानी का जन्म 1 जनवरी 1941 को जयपुर में हुआ था। अभिनय के प्रति रुचि ने उन्हें रंगमंच की ओर आकर्षित किया। इसके बाद उन्होंने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया (FTII), पुणे से अभिनय का प्रशिक्षण लिया और हिंदी फिल्मों में अपना सफर शुरू किया।
शुरुआती दौर में उन्होंने कई सहायक और गंभीर भूमिकाएं निभाईं। धीरे-धीरे उनकी कॉमिक टाइमिंग ने फिल्मकारों का ध्यान खींचा और वह हिंदी सिनेमा के लोकप्रिय हास्य कलाकारों में शामिल हो गए। उन्होंने हिंदी के अलावा गुजराती सिनेमा में भी काम किया और निर्देशन के क्षेत्र में भी हाथ आजमाया।
अभिनय की अपनी शैली से बनाई अलग पहचान
असरानी की खासियत यह थी कि वह छोटे से किरदार में भी अपनी छाप छोड़ जाते थे। उनकी संवाद अदायगी, हाव-भाव और किरदारों को सहज तरीके से निभाने की कला ने उन्हें दर्शकों के बीच लोकप्रिय बनाया। उन्होंने महमूद, राजेश खन्ना और गोविंदा सहित कई प्रमुख कलाकारों के साथ काम किया।
उनकी फिल्मों के किरदार और संवाद लंबे समय तक दर्शकों की यादों में बने रहे। असरानी का जाना हिंदी सिनेमा के उस दौर की एक अहम कड़ी का अंत है, जिसमें हास्य अभिनय ने फिल्मों की कहानी और दर्शकों के मनोरंजन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
