किसानों के आगे प्रधानमंत्री का झुकना इतना हैरान क्यों कर रहा...?
गौरव मारुति।  कहते हैं कि "झुकता है जमाना झुकाने वाला चाहिए" कुछ ऐसा ही आज देश में हुआ है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज सुबह 9:00 बजे राष्ट्र को संबोधित करते हुए तीनों किसान कानून बिल वापस लेने की घोषणा करी। प्रधानमंत्री ने कहा कि आने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में हमारी सरकार तीनों किसान कानून बिल को रद्द करेगी। इस फैसले का सीधा असर देश के समस्त किसानों के साथ-साथ दिल्ली कि सीमा पर आंदोलन कर रहे किसानों पर भी पड़ेगा। जहां एक तरफ लोग इसे किसानों की बड़ी जीत कह रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ कई लोग इसे पांच राज्यों में होने वाले चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं। वहीं सत्ता के गलियारों से लेकर पत्रकारों के चर्चाओं में यह चल रहा है कि आखिर नरेंद्र मोदी झुके कैसे?   प्रधानमंत्री का झुकना इतना हैरान क्यों कर रहा है..? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 में भारत के प्रधानमंत्री बनने से पहले 13 साल तक गुजरात जैसे मजबूत राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं। पिछले 20 सालों के अपने राजनैतिक जीवन में नरेंद्र मोदी ने कई फैसले किए। कई फैसलों को जहां सम्मान मिला वहीं कई फैसलों पर बहुत सी उंगलियां भी उठी। लेकिन नरेंद्र मोदी पर कभी भी इसका फर्क नहीं पड़ा। 2014 में जब उन्होंने देश की सत्ता संभाली तो उसके बाद उन्होंने देश को हिला कर रख देने वाला नोटबंदी करने का फैसला किया। इस नोटबंदी से देश को क्या हासिल हुआ यह आज तक सवालों के घेरे में है। नरेंद्र मोदी ने अपने इस फैसले में कहा था कि इससे देश में आतंकवाद, नक्सलवाद व कालेधन में लगाम लगेगी। लेकिन सच्चाई हमारे सामने है। आतंकवाद व नक्सलवाद देश के विभिन्न राज्यों में क्या कर रहा है? यह आए दिन हमें समाचारों में देखने को मिलता है। वही जिस काले धन को रोकने की बात की गई थी। वह आज देश के आजादी के बाद से सबसे ज्यादा हो गई है। इसके अलावा इस नोटबंदी से न जाने कितने मध्यम वर्गीय मजदूर व नौकरी करने वाले युवा रातों-रात सड़क पर आ गए। लेकिन फिर भी प्रधानमंत्री पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। इसके बाद उन्होंने 2017 में देश के व्यापारी वर्ग को जीएसटी कानून दिया। अपने इस बिल में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि यह जीएसटी भारत की दशा व दिशा बदल देगा। सच्चाई यह है कि जीएसटी स्वयं बहुत से सवालों के घेरे में है। इसके अलावा राज्यों को जीएसटी में से जो हिस्सा उनका देना था। वह केंद्र सरकार देने में असफल साबित हो रही है। हालात यह है कि देश के 20 राज्यों का केंद्र सरकार पर जीएसटी जो हिस्सा राज्य को देना है वह बकाया है। इसके अलावा देश के व्यापारी वर्ग को बहुत बड़ी मार झेलनी पड़ी। लेकिन इन फैसलों से भी हो रही दिक्कतों से भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कोई फर्क नहीं पड़ा उल्टा उनका राजनैतिक कद और ज्यादा बड़ा हो गया। क्योंकि उनके किसी भी फैसले का असर तुरंत तो दिखता नहीं था। लेकिन उन फैसलों से प्रधानमंत्री व उनके पार्टी को होने वाले चुनावों में बहुत फायदा हुआ है। 2019 में दोबारा सत्ता के शीर्ष पर विराजित होने के बाद नरेंद्र मोदी ने जम्मू कश्मीर जैसे पूर्णराज्य  से आर्टिकल-370 हटाकर उसे को 2 केंद्र शासित प्रदेश में बदल दिया। अपने इस फैसले में उन्होंने कहा कि इससे जम्मू-कश्मीर व लद्दाख राज्य का विकास होगा और आतंकवाद का नामोनिशान मिट जाएगा । सच्चाई यह है कि घाटी में एक बार फिर आतंकवाद अपना पैर पसार रहा है। वही एक बार फिर कश्मीरी पंडितों को अपना घर छोड़कर बेघर होना पड़ रहा है। इसके बाद मोदी सरकार ने देश में राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ावा देने के लिए नागरिकता संशोधन कानून (The Citizenship (Amendment) Act, 2019) सीएए बिल लाया। इस नागरिकता कानून के आते ही पूरे देश में बवाल सा मच गया। देश के कोने-कोने में धरना प्रदर्शन होने लगे. बीजेपी ने इसे देश के लिए खतरा बताया। देश में सबसे बड़ा नागरिकता कानून का विरोध खुद देश की राजधानी नई दिल्ली में हुआ। जिसे शाहीन बाग के नाम से जाना जाता है। इसी नागरिकता संशोधन कानून के चलते देश की राजधानी में एक बार फिर से दंगे हुए। वहीं शाहीन बाग में हो रहे धरने के चलते व्यापारियों व क्षेत्र के लोगों का भारी मात्रा में नुकसान हुआ। लेकिन इन सभी चीजों के बावजूद न तो केंद्र सरकार इस मुद्दे पर झुकी ना ही इस मुद्दे से पर प्रधानमंत्री के तरफ से कुछ भी बोला गया।  तो फिर किसानों के सामने ही क्यों झुकी सरकार..? पिछले वर्ष कोरोनावायरस महामारी के दौरान जून महीने में सरकार ने 3 नए कृषि कानूनों को नोटिफिकेशन के माध्यम से सक्रिय कर दिया इन तीनों के साल बिल के नाम थे  - आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून, 2020 ( Essential Commodities Amendment Bill 2020)  कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) कानून, 2020  (Farmers' Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Bill, 2020) कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून, 2020 (Farmers (Empowerment and Protection) Agreement on Price Assurance and Farm Services Bill, 2020)। नोटिफिकेशन के बाद सरकार ने संसद के सत्र में इस बिल को बहुमत के दम पर पारित करा लिया. हालांकि जब यह बिल सदन में पेश हुआ था। उस समय भी विरोधी सांसदों ने भारी विरोध प्रदर्शन किया था। लेकिन इससे भी सरकार की छवि पर कोई असर नहीं पड़ा। जब किसान बिल संसद से पास हो गया उसके बाद किसानों ने भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के बैनर तले अपना विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। इसके बाद नवंबर 2020 से किसान राजधानी दिल्ली के गाजीपुर बॉर्डर पर तीनों किसान बिल वापस कराने के लिए आमरण अनशन पर बैठ गए। देखते ही देखते यह मामला किसान बनाम सरकार का हो गया। शुरुआत में सरकार ने इन कृषि कानूनों पर सख्त रुख अपनाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ सरकार बार-बार कृषि कानून को लागू करने की बात करती रही। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने कृषि कानून को किसानों का सच्चा हितैषी बता डाला था। किसान और सरकार के बीच नई दिल्ली के विज्ञान भवन में कई दौर की बातचीत हुई। लेकिन यह सारे बातचीत बेनतीजा निकले। देश का प्रमुख मीडिया वर्ग किसानों को कभी खालिस्तानी तो कभी देशद्रोही बताने लगा। किसान मामले को लेकर देश ही नहीं विदेशों में भी प्रदर्शन होने लगे। लेकिन इन सभी चीजों के बावजूद केंद्र सरकार अपने रुख पर अड़ी रही। स्वयं देश के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा था कि चाहे दुनिया की कोई भी ताकत आ जाए किसान कानून बिल वापस नहीं होगा। किसानों के आंदोलन के चलते दिल्ली क्षेत्र को प्रतिदिन 500 करोड़ रुपए से ज्यादा का घाटा उठाना पड़ रहा था। लेकिन इसके बावजूद यह प्रदर्शन खत्म नहीं हुआ। मामले में रोचक मोड़ तब आया जब 26 जनवरी 2021 को नई दिल्ली में किसानों ने मार्च का ऐलान किया। लेकिन यह पैदल मार्च देखते ही देखते एक दंगे की शक्ल में अख्तियार होने लगा और फिर 26 जनवरी के दिन वह हुआ जिसने देश की अस्मिता को कलंकित कर दिया। आजादी के सबसे बड़े गवाह लाल किले की चौखट पर चढ़कर असामाजिक तत्वों ने भारत का झंडा उतार कर अपना झंडा लगा दिया। हालांकि यह कृत्य किसानों द्वारा नहीं किया गया था। लेकिन फिर भी इस मामले को किसानों से ही जोड़कर देखा गया। सरकार और मीडिया ने इस घटना के लिए किसानों को ही दोष दिया और लगने लगा कि अब किसान आंदोलन खत्म हो जाएगा। लेकिन तभी भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राकेश सिंह टिकट के आंसुओं ने सारा खेल ही पलट दिया। राकेश टिकट के आंसू ने किसानों को बल दिया और वह मजबूती के साथ फिर से शांतिपूर्वक आंदोलन करने लगे।  कैसे झुकने को मजबूर हुए प्रधानमंत्री मोदी किसानों के सामने किसान आंदोलन के चलते देश भर से किसानों के प्रति सहानुभूति जुटने लगी और सरकार के खिलाफ लोगों की नाराजगी सामने आने लगी। हम सभी जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में आने वाले महीनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए उत्तर प्रदेश दोबारा जितना प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। क्योंकि देश की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही जाता है। स्वयं प्रधानमंत्री मोदी यूपी के वाराणसी से सांसद हैं। किसान बिल के चलते पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान सरकार से नाराज चल रहे थे। बीते 3 अक्टूबर को लखीमपुर में हुई हिंसा ने किसानों के समर्थन में देशभर में जनसैलाब उमड़ पड़ा। जिस तरह किसानों को रौंदा गया उस घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। विधानसभा चुनाव के मद्देनजर बीजेपी कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी। इसीलिए आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संदेश में तीनों किसान बिल वापस लेने का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि हमने किसानों को समझाने का अत्यधिक प्रयास किया लेकिन कुछ कारण वश किसान और सरकार में सहमति नहीं बन पाई। इसीलिए हमारी सरकार तीनों किसान बिल वापस लेने का ऐलान करती है  उनके इस ऐलान से देश की राजनीति में एक भूचाल सा आ गया है। क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि अभी तक ना झुकने वाली सरकार के रूप में बन चुकी थी। इतने कठिनाइयों वाले फैसलों के बावजूद सरकार नहीं झुकी। लेकिन देश के अन्नदाता ने सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया। लोग इसे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं। लेकिन इस ऐलान के बाद बीजेपी को पश्चिमी यूपी में कितना फायदा होगा यह तो आने वाले चुनाव परिणाम ही बताएंगे। फिलहाल बीजेपी ने किसान बिल वापस लेने का ऐलान करके विपक्ष से एक बहुत बड़ा मुद्दा छीन लिया है।   किसानों का रूख क्या है..? वहीं इस मामले में किसानों के सबसे बड़े संगठन भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राकेश टिकट ने कहा है कि हमारा आंदोलन तब खत्म होगा जब सरकार तीनों किसान बिल वापस ले लेगी। जब तक यह सरकार किसान बिल वापस नहीं लेती है तब तक हम किसान नहीं हटेंगे। जब उनसे सवाल किया गया कि क्या यह किसानों की जीत है? तो उन्होंने कहा कि यह देश के हर एक अन्नदाता की जीत है जिसे इस सरकार के काले कानूनों की वजह से इतनी समस्याओं का सामना करना पड़ा। लेकिन अभी भी हमारी लड़ाई खत्म नहीं हुई है। एमएसपी सहित तमाम मुद्दे ऐसे हैं कि जिस पर अभी सरकार से बातचीत करनी बाकी है। उन्होंने कहा कि हमारी तो पहले दिन से ही यह मांग थी कि यह तीनों काले कानून वापस हो। हम आंदोलन उसी दिन खत्म करेंगे जिस दिन सरकार इन तीनों किसान बिल को कानूनन वापस ले लेगी। वहीं सरकार के इस फैसले के बाद दिल्ली में आंदोलन कर रहे किसानों ने एक दूसरे को मिठाई खिलाई और जश्न मनाया। किसानों ने कहा कि यह हमारे मेहनत वह गांधीवादी तरीके से लड़ी हुई लड़ाई की जीत है।   अब देखना दिलचस्प होगा कि नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा तीनों किसान बिल वापस लिए जाने का फैसला उन्हें और उनकी पार्टी को कितना फायदा पहुंचाता है। वर्तमान समय के लिए तो उन्होंने यह फैसला करके भारतीय राजनीति में एक ब्लेंडर गेम खेल दिया है।

कहते हैं कि "झुकता है जमाना झुकाने वाला चाहिए" कुछ ऐसा ही आज देश में हुआ है। देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज सुबह 9:00 बजे राष्ट्र को संबोधित करते हुए तीनों किसान कानून बिल वापस लेने की घोषणा करी। प्रधानमंत्री ने कहा कि आने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में हमारी सरकार तीनों किसान कानून बिल को रद्द करेगी। इस फैसले का सीधा असर देश के समस्त किसानों के साथ-साथ दिल्ली कि सीमा पर आंदोलन कर रहे किसानों पर भी पड़ेगा। जहां एक तरफ लोग इसे किसानों की बड़ी जीत कह रहे हैं। वहीं दूसरी तरफ कई लोग इसे पांच राज्यों में होने वाले चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं। वहीं सत्ता के गलियारों से लेकर पत्रकारों के चर्चाओं में यह चल रहा है कि आखिर नरेंद्र मोदी झुके कैसे?


प्रधानमंत्री का झुकना इतना हैरान क्यों कर रहा है..?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 में भारत के प्रधानमंत्री बनने से पहले 13 साल तक गुजरात जैसे मजबूत राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं। पिछले 20 सालों के अपने राजनैतिक जीवन में नरेंद्र मोदी ने कई फैसले किए। कई फैसलों को जहां सम्मान मिला वहीं कई फैसलों पर बहुत सी उंगलियां भी उठी। लेकिन नरेंद्र मोदी पर कभी भी इसका फर्क नहीं पड़ा। 2014 में जब उन्होंने देश की सत्ता संभाली तो उसके बाद उन्होंने देश को हिला कर रख देने वाला नोटबंदी करने का फैसला किया। इस नोटबंदी से देश को क्या हासिल हुआ यह आज तक सवालों के घेरे में है। नरेंद्र मोदी ने अपने इस फैसले में कहा था कि इससे देश में आतंकवाद, नक्सलवाद व कालेधन में लगाम लगेगी। लेकिन सच्चाई हमारे सामने है। आतंकवाद व नक्सलवाद देश के विभिन्न राज्यों में क्या कर रहा है? यह आए दिन हमें समाचारों में देखने को मिलता है। वही जिस काले धन को रोकने की बात की गई थी। वह आज देश के आजादी के बाद से सबसे ज्यादा हो गई है। इसके अलावा इस नोटबंदी से न जाने कितने मध्यम वर्गीय मजदूर व नौकरी करने वाले युवा रातों-रात सड़क पर आ गए। लेकिन फिर भी प्रधानमंत्री पर इसका कोई असर नहीं पड़ा। इसके बाद उन्होंने 2017 में देश के व्यापारी वर्ग को जीएसटी कानून दिया। अपने इस बिल में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि यह जीएसटी भारत की दशा व दिशा बदल देगा।

सच्चाई यह है कि जीएसटी स्वयं बहुत से सवालों के घेरे में है। इसके अलावा राज्यों को जीएसटी में से जो हिस्सा उनका देना था। वह केंद्र सरकार देने में असफल साबित हो रही है। हालात यह है कि देश के 20 राज्यों का केंद्र सरकार पर जीएसटी जो हिस्सा राज्य को देना है वह बकाया है। इसके अलावा देश के व्यापारी वर्ग को बहुत बड़ी मार झेलनी पड़ी। लेकिन इन फैसलों से भी हो रही दिक्कतों से भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर कोई फर्क नहीं पड़ा उल्टा उनका राजनैतिक कद और ज्यादा बड़ा हो गया। क्योंकि उनके किसी भी फैसले का असर तुरंत तो दिखता नहीं था। लेकिन उन फैसलों से प्रधानमंत्री व उनके पार्टी को होने वाले चुनावों में बहुत फायदा हुआ है। 2019 में दोबारा सत्ता के शीर्ष पर विराजित होने के बाद नरेंद्र मोदी ने जम्मू कश्मीर जैसे पूर्णराज्य  से आर्टिकल-370 हटाकर उसे को 2 केंद्र शासित प्रदेश में बदल दिया। अपने इस फैसले में उन्होंने कहा कि इससे जम्मू-कश्मीर व लद्दाख राज्य का विकास होगा और आतंकवाद का नामोनिशान मिट जाएगा । सच्चाई यह है कि घाटी में एक बार फिर आतंकवाद अपना पैर पसार रहा है। वही एक बार फिर कश्मीरी पंडितों को अपना घर छोड़कर बेघर होना पड़ रहा है। इसके बाद मोदी सरकार ने देश में राष्ट्रवाद की भावना को बढ़ावा देने के लिए नागरिकता संशोधन कानून (The Citizenship (Amendment) Act, 2019) सीएए बिल लाया। इस नागरिकता कानून के आते ही पूरे देश में बवाल सा मच गया। देश के कोने-कोने में धरना प्रदर्शन होने लगे. बीजेपी ने इसे देश के लिए खतरा बताया। देश में सबसे बड़ा नागरिकता कानून का विरोध खुद देश की राजधानी नई दिल्ली में हुआ। जिसे शाहीन बाग के नाम से जाना जाता है। इसी नागरिकता संशोधन कानून के चलते देश की राजधानी में एक बार फिर से दंगे हुए। वहीं शाहीन बाग में हो रहे धरने के चलते व्यापारियों व क्षेत्र के लोगों का भारी मात्रा में नुकसान हुआ। लेकिन इन सभी चीजों के बावजूद न तो केंद्र सरकार इस मुद्दे पर झुकी ना ही इस मुद्दे से पर प्रधानमंत्री के तरफ से कुछ भी बोला गया।

तो फिर किसानों के सामने ही क्यों झुकी सरकार..?

पिछले वर्ष कोरोनावायरस महामारी के दौरान जून महीने में सरकार ने 3 नए कृषि कानूनों को नोटिफिकेशन के माध्यम से सक्रिय कर दिया इन तीनों के साल बिल के नाम थे  - आवश्यक वस्तु (संशोधन) कानून, 2020 ( Essential Commodities Amendment Bill 2020)  कृषि उत्पादन व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) कानून, 2020 
(Farmers' Produce Trade and Commerce (Promotion and Facilitation) Bill, 2020) कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून, 2020 (Farmers (Empowerment and Protection) Agreement on Price Assurance and Farm Services Bill, 2020)। नोटिफिकेशन के बाद सरकार ने संसद के सत्र में इस बिल को बहुमत के दम पर पारित करा लिया. हालांकि जब यह बिल सदन में पेश हुआ था। उस समय भी विरोधी सांसदों ने भारी विरोध प्रदर्शन किया था। लेकिन इससे भी सरकार की छवि पर कोई असर नहीं पड़ा। जब किसान बिल संसद से पास हो गया उसके बाद किसानों ने भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के बैनर तले अपना विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। इसके बाद नवंबर 2020 से किसान राजधानी दिल्ली के गाजीपुर बॉर्डर पर तीनों किसान बिल वापस कराने के लिए आमरण अनशन पर बैठ गए। देखते ही देखते यह मामला किसान बनाम सरकार का हो गया।

शुरुआत में सरकार ने इन कृषि कानूनों पर सख्त रुख अपनाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ-साथ सरकार बार-बार कृषि कानून को लागू करने की बात करती रही। खुद प्रधानमंत्री मोदी ने कृषि कानून को किसानों का सच्चा हितैषी बता डाला था। किसान और सरकार के बीच नई दिल्ली के विज्ञान भवन में कई दौर की बातचीत हुई। लेकिन यह सारे बातचीत बेनतीजा निकले। देश का प्रमुख मीडिया वर्ग किसानों को कभी खालिस्तानी तो कभी देशद्रोही बताने लगा। किसान मामले को लेकर देश ही नहीं विदेशों में भी प्रदर्शन होने लगे। लेकिन इन सभी चीजों के बावजूद केंद्र सरकार अपने रुख पर अड़ी रही। स्वयं देश के कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा था कि चाहे दुनिया की कोई भी ताकत आ जाए किसान कानून बिल वापस नहीं होगा। किसानों के आंदोलन के चलते दिल्ली क्षेत्र को प्रतिदिन 500 करोड़ रुपए से ज्यादा का घाटा उठाना पड़ रहा था। लेकिन इसके बावजूद यह प्रदर्शन खत्म नहीं हुआ। मामले में रोचक मोड़ तब आया जब 26 जनवरी 2021 को नई दिल्ली में किसानों ने मार्च का ऐलान किया। लेकिन यह पैदल मार्च देखते ही देखते एक दंगे की शक्ल में अख्तियार होने लगा और फिर 26 जनवरी के दिन वह हुआ जिसने देश की अस्मिता को कलंकित कर दिया। आजादी के सबसे बड़े गवाह लाल किले की चौखट पर चढ़कर असामाजिक तत्वों ने भारत का झंडा उतार कर अपना झंडा लगा दिया। हालांकि यह कृत्य किसानों द्वारा नहीं किया गया था। लेकिन फिर भी इस मामले को किसानों से ही जोड़कर देखा गया। सरकार और मीडिया ने इस घटना के लिए किसानों को ही दोष दिया और लगने लगा कि अब किसान आंदोलन खत्म हो जाएगा। लेकिन तभी भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राकेश सिंह टिकट के आंसुओं ने सारा खेल ही पलट दिया। राकेश टिकट के आंसू ने किसानों को बल दिया और वह मजबूती के साथ फिर से शांतिपूर्वक आंदोलन करने लगे।

कैसे झुकने को मजबूर हुए प्रधानमंत्री मोदी किसानों के सामने

किसान आंदोलन के चलते देश भर से किसानों के प्रति सहानुभूति जुटने लगी और सरकार के खिलाफ लोगों की नाराजगी सामने आने लगी। हम सभी जानते हैं कि उत्तर प्रदेश में आने वाले महीनों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए उत्तर प्रदेश दोबारा जितना प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। क्योंकि देश की सत्ता का रास्ता उत्तर प्रदेश से ही जाता है। स्वयं प्रधानमंत्री मोदी यूपी के वाराणसी से सांसद हैं। किसान बिल के चलते पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान सरकार से नाराज चल रहे थे। बीते 3 अक्टूबर को लखीमपुर में हुई हिंसा ने किसानों के समर्थन में देशभर में जनसैलाब उमड़ पड़ा। जिस तरह किसानों को रौंदा गया उस घटना ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। विधानसभा चुनाव के मद्देनजर बीजेपी कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी। इसीलिए आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संदेश में तीनों किसान बिल वापस लेने का ऐलान किया। उन्होंने कहा कि हमने किसानों को समझाने का अत्यधिक प्रयास किया लेकिन कुछ कारण वश किसान और सरकार में सहमति नहीं बन पाई। इसीलिए हमारी सरकार तीनों किसान बिल वापस लेने का ऐलान करती है  उनके इस ऐलान से देश की राजनीति में एक भूचाल सा आ गया है। क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि अभी तक ना झुकने वाली सरकार के रूप में बन चुकी थी। इतने कठिनाइयों वाले फैसलों के बावजूद सरकार नहीं झुकी। लेकिन देश के अन्नदाता ने सरकार को झुकने पर मजबूर कर दिया। लोग इसे उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से जोड़कर देख रहे हैं। लेकिन इस ऐलान के बाद बीजेपी को पश्चिमी यूपी में कितना फायदा होगा यह तो आने वाले चुनाव परिणाम ही बताएंगे। फिलहाल बीजेपी ने किसान बिल वापस लेने का ऐलान करके विपक्ष से एक बहुत बड़ा मुद्दा छीन लिया है।


किसानों का रूख क्या है..?

वहीं इस मामले में किसानों के सबसे बड़े संगठन भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राकेश टिकट ने कहा है कि हमारा आंदोलन तब खत्म होगा जब सरकार तीनों किसान बिल वापस ले लेगी। जब तक यह सरकार किसान बिल वापस नहीं लेती है तब तक हम किसान नहीं हटेंगे। जब उनसे सवाल किया गया कि क्या यह किसानों की जीत है? तो उन्होंने कहा कि यह देश के हर एक अन्नदाता की जीत है जिसे इस सरकार के काले कानूनों की वजह से इतनी समस्याओं का सामना करना पड़ा। लेकिन अभी भी हमारी लड़ाई खत्म नहीं हुई है। एमएसपी सहित तमाम मुद्दे ऐसे हैं कि जिस पर अभी सरकार से बातचीत करनी बाकी है। उन्होंने कहा कि हमारी तो पहले दिन से ही यह मांग थी कि यह तीनों काले कानून वापस हो। हम आंदोलन उसी दिन खत्म करेंगे जिस दिन सरकार इन तीनों किसान बिल को कानूनन वापस ले लेगी। वहीं सरकार के इस फैसले के बाद दिल्ली में आंदोलन कर रहे किसानों ने एक दूसरे को मिठाई खिलाई और जश्न मनाया। किसानों ने कहा कि यह हमारे मेहनत वह गांधीवादी तरीके से लड़ी हुई लड़ाई की जीत है।

अब देखना दिलचस्प होगा कि नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा तीनों किसान बिल वापस लिए जाने का फैसला उन्हें और उनकी पार्टी को कितना फायदा पहुंचाता है। वर्तमान समय के लिए तो उन्होंने यह फैसला करके भारतीय राजनीति में एक ब्लेंडर गेम खेल दिया है।

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