Madhubani News: चलू मिथिला के मान बढ़ावी से गुंजा हरिशंकर संगीत महाविद्यालय, मासिक समारोह में सजी सुरो की महफिल
मधुबनी। शहर के बाबू साहेब चौक पर स्थित हरिशंकर संगीत महाविद्यालय के परिसर में रविवार को वैदेही कला परिषद का मासिक कार्यक्रम भक्तिमय और उत्साहपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में शास्त्रीय संगीत, भजन और मैथिली गीतों की ऐसी सरिता बही कि पूरा परिसर मानो देव मंदिर सा प्रतीत हुआ। कलाकारों ने समर्पण भाव से एक से बढ़कर एक प्रस्तुतियां दीं।
कार्यक्रम का शुभारंभ श्रीमती पिंकी महतो ने 'जयति जय जय मां सरस्वती' और भजन 'नगरी हो अयोध्या सी' से किया। उनकी सुमधुर प्रस्तुति पर दर्शकों ने जमकर तालियां बजाईं। ममता मिश्र ने 'सुख के सब साथी दुख में ना कोई' और 'तेरी मंद मंद मुस्कनिया' गाकर खूब वाहवाही लूटी। सुबोध मंडल ने निर्गुण 'अपने किशोरी जी के टहल बजैबे' और 'सब दिन होत न एक समान' गाकर माहौल को भक्तिरस से सराबोर कर दिया।
वैदेही कला परिषद केवल एक संस्था नहीं, बल्कि मिथिला की आत्मा की प्रतिध्वनि है। जिस दौर में पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण युवा पीढ़ी को अपनी जड़ों से दूर कर रहा है, उस समय यह परिषद दीपस्तंभ की तरह खड़ी है। परिषद का जन्म ही इस उद्देश्य से हुआ था कि मिथिला की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर, शास्त्रीय संगीत की गूढ़ परंपरा, मैथिली भाषा का माधुर्य और भक्ति संगीत की रसधारा को अगली पीढ़ी तक सुरक्षित पहुंचाया जाए।
पिछले कई दशकों से परिषद ने बिना किसी सरकारी अनुदान के, केवल जनसहयोग और कला के प्रति निष्ठा के बल पर मासिक कार्यक्रमों की अविरल श्रृंखला चलाई है। यह अपने आप में एक मिसाल है। हर माह बाबू साहब चौक स्थित हरिशंकर संगीत महाविद्यालय का यह परिसर कला-साधकों के लिए तीर्थ बन जाता है। यहां मंच की चकाचौंध नहीं, सुरों की साधना है। दिखावा नहीं, समर्पण है।
परिषद की सबसे बड़ी विशेषता है नवोदित कलाकारों को मंच देना। आज जो सौम्या मिश्रा इंडियन आइडल के मंच तक पहुंची हैं, उनकी पहली स्वर-साधना इसी मंच से शुरू हुई थी। 6 वर्ष की जान्हवी मिश्र जैसी बाल प्रतिभाएं जब यहां गाती हैं तो लगता है कि मिथिला का भविष्य सुरक्षित हाथों में है। परिषद ने यह सिद्ध किया है कि प्रतिभा को उम्र, पैसा या संपर्क की जरूरत नहीं होती, उसे सिर्फ अवसर चाहिए।
83 वर्षीय अध्यक्ष भोलानंद झा स्वयं इस परंपरा के जीवंत उदाहरण हैं। उनका जीवन संगीत को समर्पित रहा है। वे न केवल प्रशासक हैं बल्कि स्वयं गायक, मार्गदर्शक और प्रेरणा-स्रोत हैं। उनके नेतृत्व में परिषद ने 'गुरु-शिष्य परंपरा' को जीवित रखा है। प्राचार्य रविशंकर मिश्र, आशुतोष झा, वेदांत झा जैसे कलाकार निस्वार्थ भाव से नई पीढ़ी को तैयार कर रहे हैं।
परिषद का कार्यक्षेत्र केवल संगीत तक सीमित नहीं है। यह मिथिला पेंटिंग, लोकनाट्य, साहित्य और नैतिक मूल्यों के संरक्षण का भी केंद्र है। पं. उमेश मिश्रा जैसे विद्वान संरक्षक के मार्गदर्शन में परिषद 'चलू मिथिला के मान बढ़ावी' के संकल्प को जी रही है। हर कार्यक्रम में मैथिली भाषा, बेटी-बचाओ, संस्कार और भक्ति का संदेश अंतर्निहित रहता है।
आज जब बाजारवाद कला को वस्तु बना रहा है, वैदेही कला परिषद ने कला को साधना बनाए रखा है। यहां प्रवेश निःशुल्क है, क्योंकि परिषद मानती है कि सरस्वती बिकती नहीं, बाँटी जाती है। दर्शक दीर्घा में बैठे ज्योति रमन झा 'बाबा', कवि दयानंद झा जैसे वरिष्ठ जन जब कार्यक्रम की सराहना करते हैं, तो वह परिषद के वर्षों की तपस्या का प्रमाण पत्र होता है।
मिथिला की पहचान मखान, माछ और पान से ही नहीं, मधुर संगीत से भी है। विद्यापति की भूमि पर सुरों की यह अविरल धारा बहती रहे, इसके लिए वैदेही कला परिषद का होना जरूरी है। यह परिषद आने वाली पीढ़ियों को यह याद दिलाती रहेगी कि हम कौन हैं, हमारी जड़ें कहां हैं। वास्तव में यह संस्था 'संस्कृति संरक्षण में अग्रणी' ही नहीं, 'संस्कृति निर्माण में भी अग्रणी' है। मिथिलावासी होने के नाते हम सबका दायित्व है कि इस यज्ञ में अपनी आहुति दें।
रत्नप्रिया झा ने 'बाबा लेने चलीयौ हमरो अपन नगरी' और स्नेहा वत्स ने 'रेलिया बैरन' की मनमोहक प्रस्तुति दी। डॉ. अवधेश झा के मैथिली गीत 'मोरा रे आंगनवा चानन के गछिया' ने श्रोताओं को श्रृंगार रस से ओत-प्रोत कर दिया। राघव कुमार झा ने 'जगदंबा ही अबलंब हमर' प्रस्तुत कर माहौल को और भक्तिमय बना दिया।
परिषद के 83 वर्षीय अध्यक्ष भोलानंद झा ने जब भजन 'ठुमक चलत रामचंद्र' गाया तो श्रोताओं के समक्ष साक्षात बाल राम का चित्र उपस्थित हो गया। बाल कलाकार जान्हवी मिश्र, उम्र 6 वर्ष, ने 'सिया जी बहिनिया हमार' और 'माँ तू कितनी अच्छी है' सुनाकर सभी को झूमने पर मजबूर कर दिया।
संस्था के संस्थापक संरक्षक और चेतना समिति, पटना के उपाध्यक्ष पं. उमेश मिश्रा ने अपनी स्वरचित रचनाएं 'चलू मिथिला के मान बढ़ावी' और 'हे मईया सुनियो कनि पुकार' विलक्षण अंदाज में प्रस्तुत कीं।
कार्यक्रम के अंत में इंडियन आइडल फेम सौम्या मिश्रा, आकाशवाणी दिल्ली, ने राग यमन में शास्त्रीय गायन प्रस्तुत किया। इसके बाद 'सुनु सुनु रसिया', 'बाबा बैजनाथ हम आयल छी दुवरिया' एवं 'जय राधे राधे' सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा।
संगत में हारमोनियम पर प्राचार्य रविशंकर मिश्र और तबले पर आशुतोष झा व वेदांत झा ने कुशल साथ दिया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता भोलानंद झा ने की, संचालन रविशंकर मिश्र ने किया और धन्यवाद ज्ञापन सुबोध मंडल ने दिया। विशिष्ट अतिथि उमेश मिश्र ने सौम्या मिश्रा को पाग-दुपट्टा से सम्मानित किया।
इस अवसर पर ज्योति रमन झा 'बाबा', वेदानंद साह, रेवती रमण झा, कवि दयानंद झा, संपूर्णानंद झा, गंभीर कुमार मिश्र समेत नगर के कई गणमान्य लोग उपस्थित थे। सभी ने कार्यक्रम की मुक्त कंठ से सराहना की।
