कौन थे उमाशंकर सिंह? छात्र नेता से बसपा के इकलौते विधायक बनने तक का सफर, 55 की उम्र में दुनिया को कहा अलविदा
कौन थे उमाशंकर सिंह? छात्र नेता से बसपा के इकलौते विधायक बनने तक का सफर, मायावती बोलीं- 'वो मुझे सगी बहन मानते थे'
बलिया। उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) का जब भी जिक्र होगा, तो रसड़ा विधानसभा से लगातार तीन बार विधायक रहे ठाकुर उमाशंकर सिंह का नाम सम्मान के साथ लिया जाएगा।
वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में जब बसपा का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा और पूरी पार्टी से सिर्फ एक ही विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचा, तब वह नाम था उमाशंकर सिंह। उन्होंने न सिर्फ पार्टी का सम्मान बचाया, बल्कि विधानसभा में बसपा विधायक दल के नेता की जिम्मेदारी भी संभाली।
5 अगस्त 2026 को दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में ब्रेन कैंसर से लंबी लड़ाई के बाद उनका निधन हो गया। उनके निधन की खबर मिलते ही बलिया, रसड़ा समेत पूरे पूर्वांचल और प्रदेश की राजनीति में शोक की लहर दौड़ गई।
उनके समर्थकों, कार्यकर्ताओं और आम जनता के लिए यह एक अपूरणीय क्षति मानी जा रही है।
गांव के किसान परिवार से निकलकर राजनीति तक का सफर
ठाकुर उमाशंकर सिंह का जन्म 2 जनवरी 1971 को उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के रसड़ा तहसील स्थित खनवर गांव में हुआ था। उनके पिता घुराहू सिंह भारतीय सेना में कार्यरत रहे और सेवानिवृत्त सैनिक थे।
परिवार खेती-किसानी से जुड़ा था, जहां अनुशासन, परिश्रम और सेवा की भावना बचपन से ही उन्हें विरासत में मिली।
उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा सरकारी विद्यालयों से प्राप्त की। इसके बाद बलिया के सतीश चंद्र कॉलेज में उच्च शिक्षा ग्रहण की। छात्र जीवन से ही उनमें नेतृत्व क्षमता दिखाई देने लगी थी।
छात्र राजनीति से शुरू हुआ राजनीतिक सफर
कॉलेज के दिनों में ही उमाशंकर सिंह छात्र राजनीति में सक्रिय हो गए। वर्ष 1990 में छात्रसंघ के महामंत्री चुने गए और बाद में छात्र नेतृत्व के मजबूत चेहरे के रूप में उभरे।
छात्र राजनीति ने उन्हें जनसंपर्क, संगठन और नेतृत्व की बारीकियां सिखाईं, जो आगे चलकर उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी ताकत बनीं।
जिला पंचायत सदस्य से विधायक बनने तक का सफर
राजनीति में सक्रिय रहने के बाद वर्ष 2000 में पहली बार जिला पंचायत सदस्य निर्वाचित हुए। इसके बाद उन्होंने बहुजन समाज पार्टी के साथ अपना राजनीतिक सफर आगे बढ़ाया।
वर्ष 2012 में पहली बार बसपा के टिकट पर रसड़ा विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और शानदार जीत दर्ज कर पहली बार विधायक बने। यह उनके राजनीतिक जीवन का सबसे बड़ा मोड़ साबित हुआ।
लगातार तीन चुनाव जीतकर बनाया रिकॉर्ड
उमाशंकर सिंह ने अपने क्षेत्र में लगातार जनता का विश्वास जीतते हुए तीन विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की।
2012 – पहली बार रसड़ा से विधायक बने। 2017 – भाजपा प्रत्याशी राम इकबाल सिंह को 33,887 मतों से हराकर दूसरी बार विधायक बने। 2022 – तीसरी बार जीत दर्ज की और उत्तर प्रदेश विधानसभा में बसपा के इकलौते विधायक बने।
2022 का चुनाव उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है। पूरे प्रदेश में बसपा का प्रदर्शन बेहद कमजोर रहा, लेकिन रसड़ा की जनता ने उमाशंकर सिंह पर फिर भरोसा जताया। इसी के बाद उन्हें बसपा विधायक दल का नेता नियुक्त किया गया।
रसड़ा की राजनीति का सबसे मजबूत चेहरा
लगातार तीन बार विधायक चुने जाने वाले उमाशंकर सिंह ने रसड़ा विधानसभा में विकास, जनसंपर्क और संगठन के दम पर अपनी अलग पहचान बनाई। विपक्ष में रहते हुए भी उन्होंने विधानसभा में क्षेत्र के विकास, किसानों, युवाओं, शिक्षा, सड़क और स्वास्थ्य जैसे मुद्दों को मजबूती से उठाया।
उनकी कार्यशैली ऐसी थी कि राजनीतिक विरोधी भी उनके व्यवहार और जनसंपर्क की सराहना करते थे।
सिर्फ नेता नहीं, समाजसेवी भी थे उमाशंकर सिंह
उमाशंकर सिंह राजनीति के साथ-साथ सामाजिक कार्यों के लिए भी पूरे प्रदेश में चर्चा में रहे। उन्होंने वर्ष 2016 में 351 हिंदू और मुस्लिम जोड़ों का सामूहिक विवाह कराया, जिसकी पूरे प्रदेश में चर्चा हुई।
इसके अलावा रसड़ा विधानसभा क्षेत्र में 40 निशुल्क Wi-Fi हॉटस्पॉट शुरू कराकर युवाओं को डिजिटल सुविधा उपलब्ध कराने की पहल की।
गरीबों की मदद, सामूहिक विवाह, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक कार्यों के कारण उन्होंने राजनीति से अलग समाजसेवी नेता की भी पहचान बनाई।
एक बार गई विधायकी, फिर बहाल हुई
अपने राजनीतिक जीवन में एक समय ऐसा भी आया जब दो लाभ के पद से जुड़े मामले में उनकी विधायकी समाप्त हो गई थी। हालांकि बाद में कानूनी प्रक्रिया के बाद उनकी सदस्यता बहाल हो गई और उन्होंने फिर पूरी मजबूती के साथ राजनीति जारी रखी।
परिवार और निजी जीवन
उमाशंकर सिंह अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनकी पत्नी पुष्पा सिंह उनकी कंपनी सी.एस. इंफ्राकंस्ट्रक्शन लिमिटेड की मैनेजिंग डायरेक्टर हैं।
उनकी बेटी यामिनी सिंह का विवाह वर्ष 2019 में हुआ था, जबकि बेटे प्रिंस युकेश सिंह का विवाह वर्ष 2024 में हुआ।
प्रिंस युकेश कंपनी के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) हैं। उनकी पत्नी कनिका सिंह उत्तर प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिनेश प्रताप सिंह की भतीजी हैं। इस विवाह समारोह में बसपा सुप्रीमो मायावती भी शामिल हुई थीं।
मायावती से था बहन जैसा रिश्ता
बसपा प्रमुख मायावती और उमाशंकर सिंह के बीच राजनीतिक संबंधों से कहीं अधिक पारिवारिक अपनापन था। उनके निधन के बाद श्रद्धांजलि देने पहुंचीं मायावती बेहद भावुक दिखाई दीं।
उन्होंने परिवार को ढांढस बंधाते हुए कहा "उमाशंकर सिंह मुझे अपनी सगी बहन की तरह मानते थे। मैं लखनऊ में रहूं या दिल्ली में, वह हर साल रक्षाबंधन पर मुझसे राखी बंधवाने आते थे। राजनीति में कई लोगों ने साथ छोड़ा, लेकिन उमाशंकर सिंह ने कभी धोखा नहीं दिया। उनका यह अपनापन मैं कभी नहीं भूल सकती।"
उन्होंने यह भी कहा कि यदि परिवार की इच्छा होगी तो उनके बेटे को राजनीति में आगे बढ़ने का पूरा अवसर दिया जाएगा और पार्टी में वही सम्मान दिलाने का प्रयास किया जाएगा, जो उमाशंकर सिंह को मिला था।
ब्रेन कैंसर से लंबी लड़ाई के बाद निधन
पिछले काफी समय से उमाशंकर सिंह ब्रेन कैंसर से पीड़ित थे। इलाज के लिए उन्हें अमेरिका भी ले जाया गया, लेकिन बीमारी चौथे चरण तक पहुंच चुकी थी। अंततः 5 अगस्त 2026 को दिल्ली के फोर्टिस अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। निधन के समय उनकी आयु 55 वर्ष थी।
पैतृक गांव में होगा अंतिम संस्कार
उमाशंकर सिंह का अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव खनवर (रसड़ा, बलिया) में पूरे राजकीय और राजनीतिक सम्मान के साथ किया जाएगा।
पूर्वांचल की राजनीति में हमेशा याद किए जाएंगे उमाशंकर सिंह
उमाशंकर सिंह का राजनीतिक जीवन संघर्ष, जनसेवा और संगठन के प्रति समर्पण की मिसाल रहा। छात्र राजनीति से शुरू हुआ उनका सफर जिला पंचायत सदस्य, तीन बार विधायक और फिर बसपा विधायक दल के नेता तक पहुंचा।
कठिन राजनीतिक परिस्थितियों में भी उन्होंने पार्टी का साथ नहीं छोड़ा और अंत तक बसपा के सबसे भरोसेमंद नेताओं में गिने गए।
लगातार तीन बार जनता का विश्वास जीतना, सामाजिक कार्यों के जरिए अलग पहचान बनाना और विपक्ष में रहते हुए भी क्षेत्र की आवाज बुलंद करना उन्हें पूर्वांचल की राजनीति के प्रभावशाली नेताओं की श्रेणी में शामिल करता है।
उनके निधन से केवल बसपा ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति ने एक अनुभवी, जुझारू और जनप्रिय नेता को खो दिया।