वाराणसी में 483 साल पुरानी विश्वप्रसिद्ध भरत मिलाप लीला संपन्न, राम-भरत के मिलन के साक्षी बने श्रद्धालु

नाटी इमली में गूंजा जय श्रीराम का जयघोष, ऐतिहासिक भरत मिलाप लीला संपन्न
 

वाराणसी। धर्म और संस्कृति की नगरी काशी में गुरुवार को नाटी इमली का विश्वप्रसिद्ध भरत मिलाप आयोजन संपन्न हो गया। सदियों पुरानी इस परंपरा में भगवान श्रीराम और उनके अनुज भरत के मिलन का भावपूर्ण प्रसंग देखने के लिए श्रद्धालुओं में खासा उत्साह रहा। इस ऐतिहासिक आयोजन ने एक बार फिर काशी की धार्मिक आस्था, सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत की।

नाटी इमली का भरत मिलाप वाराणसी के प्रमुख धार्मिक आयोजनों में शामिल है। करीब पांच मिनट की लीला में भगवान श्रीराम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के मिलन का दृश्य प्रस्तुत किया जाता है। मान्यता और परंपरा से जुड़े इस भावुक प्रसंग को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु जुटते हैं। भाइयों के मिलन का दृश्य भक्तों के लिए विशेष आस्था और भावनात्मक जुड़ाव का केंद्र रहता है। 

तिथि परिवर्तन के बावजूद कायम रही परंपरा


इस वर्ष पंचांग की तिथियों में बदलाव के कारण भरत मिलाप का आयोजन विजयादशमी के दो दिन बाद, 22 अक्टूबर को किया गया। श्रीचित्रकूट रामलीला समिति की ओर से आयोजित इस लीला को काशी की प्राचीन धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। आयोजन की ऐतिहासिक पहचान और धार्मिक महत्व इसे देशभर में विशिष्ट बनाते हैं। 

काशीराज परिवार की सहभागिता भी रही खास


भरत मिलाप की परंपरा में काशीराज परिवार की सहभागिता का भी विशेष महत्व है। वर्ष 1796 में महाराजा उदित नारायण सिंह के समय से इस आयोजन में राजपरिवार की उपस्थिति की परंपरा शुरू हुई थी। इस वर्ष भी काशीराज परिवार के प्रतिनिधि कुंवर अनंतनारायण सिंह की सहभागिता निर्धारित थी।

काशी की सांस्कृतिक पहचान है भरत मिलाप


नाटी इमली का भरत मिलाप केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि काशी की सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक भी है। पीढ़ियों से चली आ रही इस परंपरा में स्थानीय लोगों की भागीदारी और श्रद्धालुओं की आस्था इसे विशिष्ट बनाती है। हर वर्ष आयोजित होने वाली यह लीला काशी की उस परंपरा को जीवंत रखती है, जिसमें धर्म, लोकसंस्कृति और सामाजिक सहभागिता का अनूठा संगम देखने को मिलता है।