अनंत चतुर्दशी पर जन्म लेंगे लंकेश, दशहरे पर राम की प्रत्यंचा करेगी दशानन का संहार 

काशी में रामलीला का महासंग्राम तैयार, 25 सितंबर को रावण जन्म से होगा शुभारंभ
 
25 सितंबर को रावण जन्म के साथ शुरू होगी रामनगर की रामलीला, दशहरे पर होगा दशानन का वध

वाराणसी। विश्वप्रसिद्ध रामनगर की रामलीला में एक बार फिर धर्म, आस्था और परंपरा का विराट स्वरूप देखने को मिलेगा। मुक्ताकाशीय मंच की सबसे बड़ी और करीब एक माह तक चलने वाली रामनगर की रामलीला का शुभारंभ अनंत चतुर्दशी के दिन 25 सितंबर को रावण के जन्म के साथ होगा। लीला को लेकर तैयारियां अंतिम चरण में हैं। पात्रों के प्रशिक्षण के साथ ही मुखौटों की सफाई, सजावट और वेशभूषा को अंतिम रूप देने का काम तेजी से चल रहा है।

रामनगर की रामलीला की खासियत इसका पारंपरिक स्वरूप है। लीला के दौरान अलग-अलग स्थानों पर पात्र अपने किरदारों का मंचन करते हैं और मानस की चौपाइयों के पाठ के साथ कथा आगे बढ़ती है। यहां आधुनिक मंचीय प्रकाश व्यवस्था के बजाय पंचलाइट और महताबी रोशनी का प्रयोग किया जाता है। इसी पारंपरिक रोशनी में रामलीला के दृश्य जीवंत होते हैं और आयोजन की प्राचीन गरिमा बरकरार रहती है।


रावण के जन्म से शुरू होने वाली रामलीला में राम जन्म, वनगमन, सीता हरण, लंका दहन और युद्ध समेत रामचरितमानस के प्रमुख प्रसंगों का मंचन होगा। लीला के अंतिम चरण में दशहरे के दिन राम के हाथों रावण का वध होगा। उस समय लंकेश का अट्टहास और भगवान राम की प्रत्यंचा की टंकार रामनगर की रामलीला के प्रमुख आकर्षणों में शामिल रहेगी।

रामलीला के आयोजन में काशी राज परिवार की भी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है। काशी नरेश पारंपरिक रूप से बग्घी पर सवार होकर लीला में शामिल होते हैं। रामनगर की गलियों और विभिन्न लीला स्थलों पर उमड़ने वाली भीड़ इस आयोजन की व्यापक लोकप्रियता का प्रमाण है। काशी के अलावा देश के विभिन्न हिस्सों और विदेशों से भी श्रद्धालु व पर्यटक रामलीला देखने रामनगर पहुंचते हैं।

इस बार पात्रों को अधिक प्रभावशाली और जीवंत बनाने के लिए प्रशिक्षण पर विशेष जोर दिया जा रहा है। कलाकार संवाद, अभिनय और पारंपरिक प्रस्तुति शैली का अभ्यास कर रहे हैं। वहीं लीला में इस्तेमाल होने वाले मुखौटों और पारंपरिक वेशभूषा को भी सजाया-संवारा जा रहा है।

रामनगर की रामलीला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि काशी की समृद्ध सांस्कृतिक परंपरा और लोक आस्था की जीवंत विरासत है। पीढ़ियों से चली आ रही यह परंपरा आज भी अपने पारंपरिक स्वरूप में लोगों को आकर्षित करती है। लीला के माध्यम से राम के आदर्श, मर्यादा, सत्य और धर्म की स्थापना का संदेश दर्शकों तक पहुंचता है।