Durga puja 2026: हथुआ मार्केट में इस बार दिखेगा अंकोरवाट मंदिर का भव्य स्वरूप
वाराणसी। दुर्गा पूजा को लेकर हथुआ मार्केट स्थित प्रीमियर बॉयज क्लब की ओर से शनिवार को प्रेस वार्ता आयोजित की गई। इस दौरान समिति के पदाधिकारियों ने इस वर्ष होने वाले दुर्गा पूजा आयोजन, पंडाल की थीम, मां दुर्गा की प्रतिमा और श्रद्धालुओं के लिए की जा रही तैयारियों की जानकारी दी।
समिति के अनुसार इस वर्ष हथुआ मार्केट में दुर्गा पूजा पंडाल को कंबोडिया के अंकोरवाट स्थित विष्णु मंदिर की तर्ज पर तैयार किया जा रहा है। पंडाल को भव्य स्वरूप दिया जा रहा है और निर्माण कार्य लगभग 90 प्रतिशत पूरा हो चुका है। पंडाल की ऊंचाई करीब 80 से 90 फीट बताई गई है।
पंडाल के भीतर श्रद्धालुओं को धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृश्यों के साथ आधुनिक तकनीक का अनुभव भी मिलेगा। यहां करीब तीन से चार मिनट का इलेक्ट्रिक शो आकर्षण का केंद्र रहेगा। पंडाल की सजावट में नूतन बालक, मां गंगा, महादेव और मां दुर्गा से जुड़े दृश्य भी प्रस्तुत किए जाने की जानकारी दी गई है।
बंगाल के कारीगर तैयार कर रहे प्रतिमाएं
दुर्गा पूजा के लिए प्रतिमा निर्माण में बंगाल से आए करीब 35 कारीगर जुटे हैं। प्रतिमाओं के निर्माण में बांस, पुआल और गंगा की मिट्टी का इस्तेमाल किया जा रहा है। मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा के साथ पूजा पंडाल में धार्मिक स्वरूप से जुड़ी अन्य प्रतिमाओं और दृश्यों को भी आकर्षक ढंग से तैयार किया जा रहा है।
समिति ने बताया कि श्रद्धालुओं की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए पंडाल परिसर में आवश्यक व्यवस्थाएं की जा रही हैं। दुर्गा पूजा के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के पहुंचने की संभावना को देखते हुए व्यवस्थाओं को अंतिम रूप दिया जा रहा है।
गौरतलब है कि वाराणसी में इस वर्ष दुर्गा पूजा को लेकर व्यापक तैयारियां चल रही हैं। जिले में छोटे-बड़े मिलाकर करीब 512 सार्वजनिक स्थानों पर मां दुर्गा की प्रतिमाएं स्थापित की जानी हैं। हथुआ मार्केट समेत कई प्रमुख स्थानों पर विशेष थीम आधारित भव्य पंडाल तैयार किए जा रहे हैं।
अंगकोरवाट: कंबोडिया में बसा हिंदू स्थापत्य का अद्भुत स्मारक, दीवारों पर उकेरी गई हैं रामायण-महाभारत की कथाएं
कंबोडिया का अंगकोरवाट मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय संस्कृति, खमेर स्थापत्य और अद्भुत शिल्पकला का ऐसा संगम है, जिसे देखने दुनिया भर से पर्यटक पहुंचते हैं। विशाल परिसर, ऊंचे शिखर, पत्थरों पर बारीक नक्काशी और सदियों पुराना इतिहास इसे दुनिया के चर्चित ऐतिहासिक स्मारकों में शामिल करता है।
भगवान विष्णु को समर्पित था मंदिर
अंगकोरवाट का निर्माण 12वीं शताब्दी में खमेर शासक सूर्यवर्मन द्वितीय के शासनकाल में कराया गया था। इसका मूल स्वरूप भगवान विष्णु को समर्पित हिंदू मंदिर के रूप में विकसित किया गया था। बाद के दौर में यहां बौद्ध परंपरा का प्रभाव बढ़ा और आज यह बौद्ध श्रद्धालुओं के लिए भी महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल है।
विशाल चबूतरे पर बना है भव्य मंदिर परिसर
मंदिर एक विशाल और ऊंचे चबूतरे पर निर्मित है। परिसर में कई स्तर हैं, जिन्हें सीढ़ियों के माध्यम से जोड़ा गया है। ऊंचे शिखर, गुंबदनुमा संरचनाएं और विस्तृत गलियारे इसकी भव्यता को और बढ़ाते हैं। केंद्रीय परिसर में पांच प्रमुख टावर हैं, जिन्हें मेरु पर्वत की प्रतीकात्मक संरचना माना जाता है।
पत्थरों पर जीवंत हैं रामायण और महाभारत के प्रसंग
अंगकोरवाट की सबसे खास विशेषताओं में इसकी दीवारों पर बनी जटिल नक्काशी शामिल है। यहां रामायण, महाभारत, समुद्र मंथन और हिंदू धार्मिक परंपराओं से जुड़े अनेक प्रसंग पत्थरों पर उकेरे गए हैं। इन नक्काशियों में तत्कालीन युद्ध, धार्मिक अनुष्ठानों और खमेर समाज के जीवन की झलक भी मिलती है।
भारतीय संस्कृति का दिखता है गहरा प्रभाव
अंगकोरवाट इस बात का महत्वपूर्ण उदाहरण है कि भारतीय धार्मिक विचारों, कला और स्थापत्य का प्रभाव दक्षिण-पूर्वी एशिया तक किस तरह पहुंचा। मंदिर की वास्तुकला में हिंदू धार्मिक प्रतीकों के साथ खमेर शिल्प परंपरा का अनूठा मेल दिखाई देता है।
सूर्योदय के समय बदल जाती है मंदिर की खूबसूरती
अंगकोरवाट में सूर्योदय देखना पर्यटकों के बीच बेहद लोकप्रिय अनुभव माना जाता है। सुबह की पहली किरणें जब मंदिर के ऊंचे शिखरों पर पड़ती हैं तो पूरा परिसर सुनहरे और नारंगी रंगों में नहाया नजर आता है। मंदिर के सामने बने जलाशय में पड़ती इसकी छवि दृश्य को और आकर्षक बना देती है।
यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल
अंगकोरवाट और इसके आसपास का अंगकोर पुरातात्विक क्षेत्र कंबोडिया की महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर है। यूनेस्को ने 1992 में अंगकोर को विश्व विरासत सूची में शामिल किया था। आज यह कंबोडिया के प्रमुख पर्यटन स्थलों में गिना जाता है।
कंबोडिया की पहचान से जुड़ा है अंगकोरवाट
अंगकोरवाट की पहचान केवल इतिहास और धर्म तक सीमित नहीं है। यह कंबोडिया की राष्ट्रीय पहचान और पर्यटन का भी महत्वपूर्ण प्रतीक है। मंदिर की छवि कंबोडिया के राष्ट्रीय ध्वज पर भी दिखाई देती है।
सदियों बाद भी कायम है स्थापत्य का आकर्षण
करीब नौ शताब्दियों पुराने इस मंदिर परिसर की विशालता और पत्थरों पर की गई बारीक कारीगरी आज भी लोगों को आश्चर्यचकित करती है। प्राचीन खमेर साम्राज्य की स्थापत्य क्षमता का यह स्मारक आज इतिहास, धर्म, कला और पर्यटन- चारों क्षेत्रों में अपनी खास पहचान बनाए हुए है।