बंगाली सस्कृति और भक्ति का अनूठा संगम, सिंदूर खेला के साथ मां दुर्गा की विदाई
वाराणसी। शारदीय नवरात्रि का उत्सव आस्था, संस्कृति और आपसी सद्भाव के रंगों से सराबोर रहा। ढाक की गूंज, शंख की पवित्र ध्वनि और मां दुर्गा की आराधना के बीच आयोजित विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने उत्सव को खास बना दिया। बैंड स्वरकाशी (Band Swarkashi) के लाइट एंड म्यूजिक शो ने लोगों को मंत्रमुग्ध किया। वहीं, बंगाली संस्कृति और परंपराओं पर आधारित कार्यक्रमों में लोगों ने उत्साहपूर्वक भागीदारी की।
उत्सव के दौरान आयोजित धुनुची नृत्य, शंख ध्वनि प्रतियोगिता और डांडिया नाइट्स आकर्षण का प्रमुख केंद्र रहे। इन कार्यक्रमों के माध्यम से धार्मिक परंपराओं, सांस्कृतिक विरासत और सामाजिक एकता का संदेश दिया गया। संगीत और रोशनी से सजी शाम ने श्रद्धालुओं के उत्साह को और बढ़ा दिया।
इस बार मां दुर्गा की प्रतिमा पारंपरिक 'शोला साज' से सुसज्जित है। सफेद रंग की इस पारंपरिक सजावट को शुद्धता, शांति और पवित्रता का प्रतीक माना जाता है। मां दुर्गा का यह अलौकिक स्वरूप उत्सव में विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है और श्रद्धालु भक्तिभाव से मां के दर्शन कर रहे हैं।
अब उत्सव के समापन के साथ मां दुर्गा को विदाई देने की तैयारी है। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार, सुबह 11 बजे मां दुर्गा के कलश का विसर्जन किया जाएगा। इसके बाद शाम चार बजे से पारंपरिक सिंदूर खेला का आयोजन होगा। वहीं, शाम 7:30 बजे से मां दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन की प्रक्रिया शुरू होगी।
सिंदूर खेला बंगाली परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसमें महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित कर सुख-समृद्धि और सौभाग्य की कामना करती हैं। प्रतिमा विसर्जन के साथ ही शारदीय नवरात्रि उत्सव का समापन होगा। श्रद्धालु नम आंखों से मां को विदाई देते हुए अगले वर्ष फिर उनके आगमन की प्रतीक्षा करेंगे। बंगाली परंपरा के प्रसिद्ध भाव 'आश्चे बोछोर आबार होबे' के साथ उत्सव को विदाई दी जाएगी।