काशी में जापान की आत्मीयता और बनारसी बुनाई की विरासत का संगम, The Panaya पहुंचीं आकिए आबे

जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की पत्नी आकिए आबे वाराणसी के The Panaya पहुंचीं। उन्होंने बनारसी साड़ी की हाथकरघा बुनाई, पारंपरिक डिजाइन और 1875 से चली आ रही विरासत को करीब से जाना। शिंजो आबे की स्मृतियों के बीच काशी से जुड़ी उनकी विरासत को नमन, चौकाघाट स्थित The Panaya में बनारसी साड़ी की बारीकियों से रूबरू हुईं आकिए आबे।
 
जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की पत्नी आकिए आबे वाराणसी के The Panaya पहुंचीं। उन्होंने बनारसी साड़ी की हाथकरघा बुनाई, पारंपरिक डिजाइन और 1875 से चली आ रही विरासत को करीब से जाना। शिंजो आबे की स्मृतियों के बीच काशी से जुड़ी उनकी विरासत को नमन, चौकाघाट स्थित The Panaya में बनारसी साड़ी की बारीकियों से रूबरू हुईं आकिए आबे।

वाराणसी। काशी और जापान के बीच सांस्कृतिक एवं भावनात्मक रिश्ते की एक खूबसूरत झलक वाराणसी में देखने को मिली। जापान के पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की पत्नी आकिए आबे ने वाराणसी पहुंचकर काशी की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ सदियों पुरानी बनारसी बुनाई की परंपरा को करीब से जाना।

 

दिसंबर 2015 में जापान के तत्कालीन प्रधानमंत्री शिंजो आबे के वाराणसी दौरे की यादें आज भी काशी से जुड़ी हुई हैं। अपने भारत दौरे के दौरान शिंजो आबे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ काशी में गंगा आरती में हिस्सा लिया था। उनके इस ऐतिहासिक दौरे की अनेक तस्वीरों को एक विशेष प्रदर्शनी में प्रदर्शित किया गया है।

 

इसी क्रम में रुद्राक्ष अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन सेंटर में अपराह्न दो बजे लोकार्पण कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम के दौरान आकिए आबे ने शिंजो आबे की काशी यात्रा से जुड़ी यादों को साझा करते हुए कहा कि यदि आज उनके पति यहां होते तो वह बेहद खुश होते। उन्होंने कहा कि शिंजो आबे की पहल से काशी में यह महत्वपूर्ण सेंटर बना और उनका न होना उनके लिए बेहद दुखद है।

आकिए आबे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जापान दौरे से जुड़ी उस पहल का भी उल्लेख किया, जिसके बाद काशी में इस महत्वपूर्ण सेंटर को विकसित करने की दिशा में काम आगे बढ़ा।

 

The Panaya पहुंचीं आकिए आबे, देखी हाथ से बन रही बनारसी साड़ियां

 

रुद्राक्ष कार्यक्रम के बाद आकिए आबे ने वाराणसी की विश्व प्रसिद्ध बनारसी साड़ी की विरासत को करीब से समझने के लिए चौकाघाट स्थित सुंदर विला में मौजूद The Panaya का दौरा किया।

 

 

The Panaya बनारसी साड़ी की परंपरा, शिल्प और विरासत को संरक्षित करने वाले प्रमुख नामों में शामिल है। यहां आकिए आबे ने पारंपरिक तरीके से हाथों से की जा रही साड़ी की बुनाई को बेहद करीब से देखा और हैंडलूम की कार्यप्रणाली को समझा।

The Panaya के CEO वीरेंद्र अग्रवाल ने आकिए आबे को बनारसी साड़ियों की बुनाई की पूरी प्रक्रिया, पारंपरिक तकनीक, डिजाइन, धागों के चयन और कारीगरों की मेहनत के बारे में विस्तार से जानकारी दी। आकिए आबे ने भी बनारसी बुनाई की बारीकियों को काफी रुचि के साथ देखा और इस पारंपरिक कला की प्रशंसा की।

1875 से चली आ रही बुनाई की परंपरा

The Panaya की विशेष पहचान इसकी लंबे समय से चली आ रही बनारसी बुनाई की परंपरा से जुड़ी है। बताया गया कि इस परंपरा की जड़ें वर्ष 1875 से जुड़ी हैं और पीढ़ियों से हाथों से बनारसी साड़ियों की बुनाई का काम आगे बढ़ता रहा है।

बनारसी साड़ी केवल एक परिधान नहीं बल्कि वाराणसी की कला, संस्कृति, शिल्प और कारीगरों की पीढ़ियों की मेहनत का प्रतीक मानी जाती है। महीन रेशम, जटिल जरी का काम, पारंपरिक मोटिफ और हाथकरघे पर की जाने वाली बुनाई इसे देश-दुनिया में विशिष्ट पहचान दिलाती है।

The Panaya की परंपरा से जुड़े इतिहास के अनुसार, यहां तैयार होने वाली साड़ियां लंबे समय से राजघरानों और प्रतिष्ठित परिवारों तक पहुंचती रही हैं। राजा-महाराजाओं और रानियों के लिए साड़ियों की आपूर्ति की परंपरा ने इस विरासत को और खास पहचान दी।

वीरेंद्र अग्रवाल ने बताई बनारसी बुनाई की कहानी

The Panaya के CEO वीरेंद्र अग्रवाल ने आकिए आबे को शोरूम और हैंडलूम हाउस की एक-एक विशेषता से परिचित कराया। उन्होंने बताया कि किस तरह बनारसी साड़ी तैयार करने में कारीगरों को महीन काम, धैर्य और वर्षों के अनुभव की आवश्यकता होती है।

आकिए आबे ने शोरूम में मौजूद अलग-अलग प्रकार की बनारसी साड़ियों को देखा और उनकी बुनाई एवं डिजाइन को समझा। उन्हें पारंपरिक हैंडलूम से लेकर तैयार साड़ियों तक की पूरी प्रक्रिया दिखाई गई।

इस दौरान उन्होंने The Panaya से खरीदारी भी की। उनके इस दौरे ने बनारसी साड़ी की वैश्विक पहचान और काशी की पारंपरिक हस्तकला के प्रति अंतरराष्ट्रीय रुचि को भी रेखांकित किया।

बनारसी साड़ी: काशी की पहचान, कारीगरों की पीढ़ियों की मेहनत

बनारसी साड़ी का नाम आते ही वाराणसी की गलियां, हथकरघे की आवाज और महीन जरी-ब्रोकेड की कारीगरी सामने आती है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी बारीक बुनाई और पारंपरिक डिजाइन हैं।

बनारसी साड़ियों में रेशम के साथ जरी का इस्तेमाल, फूल-पत्तियों के पारंपरिक मोटिफ, बेल-बूटे और जटिल पैटर्न इसे दूसरी साड़ियों से अलग पहचान देते हैं। विवाह और विशेष अवसरों पर बनारसी साड़ी की खास मांग रहती है।

काशी के बुनकरों ने इस कला को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाया है। बदलते दौर में मशीन से बने कपड़ों की बढ़ती उपलब्धता के बावजूद हाथकरघे से तैयार होने वाली असली बनारसी साड़ी की अपनी अलग प्रतिष्ठा बनी हुई है।

यही वजह है कि बनारसी साड़ी आज केवल उत्तर प्रदेश या भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि देश-दुनिया में भारतीय परंपरा और शिल्प की पहचान के तौर पर देखी जाती है।

काशी-जापान संबंधों के बीच बनारसी विरासत का नया अध्याय

आकिए आबे का The Panaya पहुंचना केवल एक शोरूम का दौरा नहीं बल्कि काशी की सदियों पुरानी हस्तशिल्प परंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलने का भी अवसर रहा।

एक तरफ रुद्राक्ष में शिंजो आबे की काशी यात्रा और उनकी स्मृतियों को समर्पित तस्वीरों की प्रदर्शनी ने भारत-जापान के रिश्तों की यादों को ताजा किया, वहीं दूसरी ओर The Panaya में आकिए आबे ने काशी की उस जीवंत विरासत को करीब से देखा, जिसे यहां के कारीगर अपने हाथों से आज भी आगे बढ़ा रहे हैं।

आकिए आबे की इस यात्रा में The Panaya और CEO वीरेंद्र अग्रवाल की ओर से काशी की बनारसी बुनाई की समृद्ध परंपरा को प्रस्तुत किया गया। यह मुलाकात इस बात का भी प्रतीक बनी कि काशी की कला और बनारसी साड़ी की पहचान सीमाओं से परे दुनिया के अलग-अलग हिस्सों तक अपनी जगह बना रही है।