आज़ादी सिर्फ तिरंगे में नहीं, सपनों को जीने के हक में भी है, मैंने आज़ादी के कई रूप देखे हैं… क्या आपने भी देखे हैं?
मैंने आज़ादी के कई रूप देखे
मैंने आज़ादी देखी है
उस छोटे बच्चे की आँखों में,
जो घाट किनारे दीये बेचता है।
मैंने आज़ादी देखी है
उस नन्ही सी बच्ची के हाथ में,
जो तिरंगा थामे सड़कों पर घूमती है।
मैंने आज़ादी देखी है
उस परिवार के सपनों में,
जो खुले चौराहे के किनारे नींद पूरी करते है।
मैंने आज़ादी देखी है
उस उस पढ़ी लिखी लड़की के हांथो में
जो मौलिक अधिकारों के लिए अपने घर पर भीख मांगती हैं।
मैंने आज़ादी देखी है
मां के आंचल में
जो खाना बनाकर पूरा जीवन निकाल देती हैं,
मैंने आज़ादी देखी हैं,
उस पिता के पैरों में जो बारिश में भी रिक्शा चला के बच्चों का पेट का पेट भरता है।
मैंने आज़ादी देखी है
उस नई दुल्हन के सिंदूर में,
जिसके आते ही
उससे किताबो को छीन लिया जाता हैं।
मैंने आज़ादी देखी है
उस लड़के के कंधों पर,
जो अपने सपनों को छोड़कर
ज़िम्मेदारियों को चुनता है।
मैंने आज़ादी देखी है
उन बूढ़े माँ-बाप की आँखों में,
जो गाँव में बैठकर
शहर में काम कर रहे अपने बच्चों का
इंतज़ार करते हैं।
मैंने आज़ादी देखी है
उन पंखों में,
जो एक छोटे से पिंजरे से झांक कर आसमां को देखते हैं।
मैंने आज़ादी देखी है
उस युवा के हौसलों में,
जो दुनिया की पाबंदियों से लड़कर
अपने सपनों को चुनता ।
मैंने आज़ादी देखी है
उन आँखों में, जो सवाल करना चाहती हैं,
उन हाथों में, जो अपनी राह चुनना चाहते हैं,
उन सपनों में,
जो किसी की इजाज़त के मोहताज नहीं।
हाँ,
मैंने आज़ादी के कई रूप देखे हैं।