भारत के जंगलों की आवाजों से अब AI सीखेगा वन्यजीव पहचानना, 518 प्रजातियों का डेटासेट तैयार
भारतीय जंगलों की आवाजों को AI की ट्रेनिंग में किया जाएगा इस्तेमाल, वन्यजीवों की पहचान और जैव विविधता की निगरानी में मिलेगी मदद
नई दिल्ली। भारत के जंगलों और प्राकृतिक पर्यावासों में मौजूद वन्यजीवों की आवाजों को अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के प्रशिक्षण के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।
वैज्ञानिकों, पारिस्थितिकीविदों और प्रकृति प्रेमियों के सहयोग से भारत का पहला ओपन-एक्सेस और क्राउडसोर्स्ड इकोएकॉस्टिक डेटासेट तैयार किया गया है। इसका मकसद AI को भारतीय वन्यजीवों की आवाजों की पहचान में अधिक सक्षम बनाना है।
25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से जुटाई गई रिकॉर्डिंग
इस अनोखे डेटासेट में 25 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की 518 प्रजातियों को शामिल किया गया है। इसमें करीब 5,815 मिनट की ऑडियो रिकॉर्डिंग मौजूद हैं। रिकॉर्डिंग में सिर्फ पक्षियों की आवाजें ही नहीं, बल्कि कीड़े, मेंढक, चमगादड़, सरीसृप और अन्य वन्यजीवों की ध्वनियां भी शामिल हैं।
जंगलों की आवाजों से समझी जाएगी जैव विविधता
घने जंगलों में कई वन्यजीवों को देख पाना मुश्किल होता है, लेकिन उनकी आवाजों को लंबे समय तक रिकॉर्ड किया जा सकता है। यही वजह है कि इकोएकॉस्टिक्स वन्यजीव निगरानी और जैव विविधता के अध्ययन का अहम माध्यम बनता जा रहा है।
ऑडियो रिकॉर्डिंग के जरिए वैज्ञानिक किसी क्षेत्र में मौजूद प्रजातियों की पहचान करने के साथ-साथ उनके व्यवहार और पर्यावरण में समय के साथ होने वाले बदलावों का भी अध्ययन कर सकते हैं।
भारत के लिए अलग AI डेटा की क्यों पड़ी जरूरत?
वन्यजीवों की आवाज पहचानने वाले कई मौजूदा AI मॉडल ऐसे डेटा पर प्रशिक्षित किए गए हैं, जो मुख्य रूप से उत्तरी गोलार्ध के देशों से आया है।
भारत की उष्णकटिबंधीय परिस्थितियां, अलग-अलग मौसम, स्थानीय प्रजातियां और मानवीय गतिविधियों से पैदा होने वाली आवाजें इन मॉडलों के लिए अलग चुनौती पेश करती हैं।
भारतीय परिस्थितियों से जुटाया गया नया डेटासेट AI मॉडल को स्थानीय वातावरण और वन्यजीवों की वास्तविक आवाजों को बेहतर ढंग से समझने में मदद कर सकता है।
5,815 मिनट की रिकॉर्डिंग का किया गया विश्लेषण
प्रोजेक्ट के तहत जुटाई गई करीब 5,815 मिनट की रिकॉर्डिंग का विशेषज्ञों ने विश्लेषण किया। इनमें लगभग 3,311 मिनट की रिकॉर्डिंग में आवाज की अवधि और आवृत्ति जैसी जानकारी को विस्तार से दर्ज किया गया। बाकी रिकॉर्डिंग में संबंधित प्रजाति की मौजूदगी की पुष्टि की गई।
डेटासेट की विश्वसनीयता जांचने के लिए स्वतंत्र विशेषज्ञों ने रिकॉर्डिंग के कुछ नमूनों का परीक्षण भी किया।
600 से ज्यादा लोगों ने दिया योगदान
इस पहल की शुरुआत प्रोजेक्ट ध्वनि से हुई और बाद में इसे इंडियन इकोएकॉस्टिक्स नेटवर्क (IEN) के रूप में आगे बढ़ाया गया। इस नेटवर्क से 600 से अधिक लोग जुड़े हैं।
साल 2025 में रिकॉर्डिंग जुटाने के लिए क्राउडसोर्सिंग अभियान चलाया गया। इसमें लोगों से वन्यजीवों की आवाजें रिकॉर्ड कर उन्हें प्रजाति संबंधी जानकारी के साथ ओपन लाइसेंस के तहत साझा करने के लिए कहा गया।
संरक्षण के लिए भी साबित हो सकता है अहम
यह डेटासेट भविष्य में वन्यजीव संरक्षण, जैव विविधता की निगरानी और पर्यावास में बदलाव को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
सूखे, जंगलों की कटाई या अन्य पर्यावरणीय बदलावों के बाद किसी क्षेत्र के 'साउंडस्केप' में होने वाले परिवर्तन का अध्ययन कर वैज्ञानिक यह पता लगा सकते हैं कि वहां रहने वाली प्रजातियों पर इसका क्या प्रभाव पड़ा है।
आगे और प्रजातियों को जोड़ा जाएगा
वैज्ञानिकों के अनुसार, यह डेटासेट अभी शुरुआती चरण में है। भविष्य में इसमें और अधिक प्रजातियों, क्षेत्रों और ऑडियो रिकॉर्डिंग को शामिल किया जा सकता है।
भारतीय परिस्थितियों से जुड़ा बड़ा और बेहतर तरीके से लेबल किया गया ऑडियो डेटाबेस AI आधारित वन्यजीव पहचान तकनीक को अधिक सटीक बनाने के साथ-साथ जैव विविधता संरक्षण और वैज्ञानिक शोध को भी नई दिशा दे सकता है।